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Saturday, May 11, 2024

शायद अगली तारीख़ पर

कुछ तीस बरस पहले यूँ हुआ,

ग़बन का झूठा इल्ज़ाम लगा। 

खेल था कुछ सफ़ेदपोशों का, 

उसका बेमतलब नाम लगा। 


खो बैठा वो अपना सब-कुछ,

सबकी नज़रों से उतर गया।

न हटेगा  झूठा दाग कभी,

ऐसा उसको अंजाम लगा। 


जो कोर्ट-कचहरी शुरू हुयी,

थामी उसने उम्मीद नयी। 

दस बरस तो यूँ ही गुज़र गए,

ज़िरह तो बस चलती ही गयी। 


हर सुनवाई पे हाज़िर होकर,

करता वो पेश सफ़ाई है। 

शायद अगली तारीख़ पर,

फ़ैसले में लिखी रिहाई है। 

पर बीत गए कुछ और बरस,

वो आज भी एक मुदालय है। 

फ़िर भी जिस से उम्मीद बची,

वो केवल एक न्यायालय है। 


इसलिए उसे परवाह नहीं,

हो कितनी तोहमत की बेड़ियाँ। 

एक फ़ैसले की ज़द्दोजहद में,

उसने है रगड़ी एड़ियां। 


आज भी एक सुनवाई है। 

ज़हन में छिड़ गयी लड़ाई है। 

भीतर से एक आवाज़ उठी,

कि घड़ी अब फ़ैसले कि आयी है। 


ऐसा टूटा कि जुड़ न सका,

जब से हैं शुरू ये सिलसिले। 

शायद इस तारीख़ पर,

अपनी शख़्सियत बेदाग़ मिले। 


Wednesday, October 25, 2023

मन मेरा यूं करता है


मन मेरा यूं करता है,

मैं हवा से अब तो बात करूँ

तेरे संग दिन को रात करूँ

पथरीली मुश्किल राहों को 

तेरे कदमों से आघात करूँ।


मन मेरा यूं करता है

अस्सी- नब्बे तो कल की बात,

सौ से आगे रफ़्तार करूँ। 

उगता सूरज तुझको देखे,

उसपे मैं ये आभार करूँ।


मन मेरा यूं कहता है

गोंद में तेरी बैठे हुए,

तेरी धड़कन का आभास करूँ।

हाँ, है ताकत मेरी मुट्ठी में,

इस तथ्य का मैं एहसास करूँ।


मन मेरा यूं कहता है

कोई आगे निकल गया तो क्या,

पहले हम मंज़िल पा लेंगे।

बस कुछ कदमों की दूरी पे,

गीत विजय के गा लेंगे।

Tuesday, January 03, 2023

वो वीर सपूत थे भारत के

पश्चिम का ही परचम था।

उम्मीद का दीपक मद्धम था।

जो गीत रचे नए कल के

आज़ादी का ही सरगम था।


ख़ुदगर्ज़ नहीं वो रहा कभी,

जब आहुति देनी पड़ी।

अपने लहू से सींची धरती,

जिसपे है आज की नींव खड़ी।


थी जिनके रग में कुर्बानी,

थी जिन्होंने आज़ादी की ठानी,

वो वीर सपूत थे भारत के

वो वीर सपूत थे भारत के।


बातों का भी दौर चला।

सत्याग्रह कुछ दिन और चला।

उनकी आंखों में जाने कब से,

एक नयी सुबह का ख़्वाब पला।


हांथ सने बारूदों से,

सीने में भी चिंगारी थी।

बेड़ियों को तोड़ने की

उनकी कवायद जारी थी।

बात विचार जो विफल हुए,

संग्राम की अब तैयारी थी।


जो रहे सदा ही निगेहबान,

थामी रण की जिसने कमान,

वो वीर सपूत थे भारत के।

वो वीर सपूत थे भारत के।



जो रास न आया प्रेम भाव,

अब उन्होंने हुंकार भरी।

जा टकराए उस हुकूमत से,

जो रही सदा अहंकार भरी।

लाठी चली, गोली चली।

फांसी का डर भी बिसर गया।

कांप उठा अब दुश्मन भी,

सुनकर गरज ललकार भरी।


जिनसे है आबाद वतन,

जिनको है सबका नमन,

थे वीर सपूत वो भारत के।

हां वीर सपूत वो भारत के।



Sunday, January 01, 2023

साहस ने साथ नहीं छोड़ा

चाहे परिस्थितियां कितनी भी विकट क्यों न हों, चाहे मनुष्य ने कितनी ही बार पराजय का सामना क्यों न किया हो, साहस ही उसका साथ हमेशा देता है। 
पतझड़ तो बीता नहीं अभी। 
क्या बहार आएगी कभी ?
पथरीली राहें  जो मिली ,
सबने मुँह फेरा तभी। 

पैरों में कांटे चुभे हुए ,
मौसम ने भी अब मुँह मोड़ा। 
मैं थम गया कुछ क्षण तो क्या,
साहस  ने  साथ  नहीं छोड़ा। 

"चल उठ जा, अब देर न कर",
रणभूमि से आह्वान है। 
दे परिचय उस साहस का,
जिससे बैरी अंजान है। 

पर चूक गया मैं लक्ष्य से,
फिर हार ने मुझको तोड़ा । 
समय खड़ा विपरीत तो क्या,
साहस  ने  साथ  नहीं छोड़ा। 

हाँ, एक संदेह ने घर किया,
भय भी अब अट्ठहास करे। 
"विजय नहीं है अब संभव",
अंतःकरण एहसास करे। 

फिर एक पुकार मन में उठी,
 टूटे मन को जिसने जोड़ा।
सब छोड़ चले तो क्या हुआ,
साहस  ने  साथ  नहीं छोड़ा।   

भूमिपुत्र

हो तपती धूप, या हो बदरी 

पेट भरे वो हर नगरी 

सींचे वो खेत लहू से भी

भले वो प्यासा हो अध्-गगरी 

आभार है भूमिपुत्र का 

आभार है भूमिपुत्र का 


कभी तूफ़ान था मंडराया 

कभी आकाल का संकट छाया 

फसलें भी बेमौत मरी 

पर उसने धैर्य था दिखलाया

संघर्ष है भूमिपुत्र का 

संघर्ष है भूमिपुत्र का 


चाहे ठिठुरे वो जाड़े में

चाहे वो झुलसे धूप  में

दुलार करे वो फ़सलों को 

ममता के हर रूप में

दुलार है भूमिपुत्र का 

दुलार है भूमिपुत्र का 

Monday, January 11, 2021

यह हार भी कुछ कह जाती है

यह हार भी कुछ कह जाती है

एक आईना सा दिखाती है। 

कहीं भी ना रुकना तुझे

सबक यही सिखलाती है।

जो ठहर गया वह टूट गया

मकसद उसका तो छूट गया।

जो रहा न कोई संग तेरे,

यह हौसला ही तेरा साथी है।


सांझ ढली तो क्या हुआ

उम्मीद की लौ न बुझे कभी।

एक नई सहर फिर आएगी

एक नई डगर भी लाएगी।

क्या कसर थी बाकी रह गई

क्या कोशिश में थी कमी कोई

क्यों खुद से ना पूछा कभी

क्यों खुद से न पूछा कभी।


जो हैं लोगों के कहकहे,

अक्सर हम को फुसलाती हैं।

 मझधारों से आगे जो बढ़े,

वही दास्तां कहलाती है।

Thursday, April 30, 2020

वो फ़नकार क्यों अलविदा कह गया


यह कविता भारत एवं विश्व में एक विख्यात कलाकार, श्री इरफ़ान खान जी को, जिन्हे हम ने कुछ वर्ष पहले खो दिया,  एवं उनके अभिनय के लिए समर्पित है। 

रूपहले परदे पे छाप थी जिसकी,
अनगिनत ही एक परिमाप थी जिसकी,
जिसने था सबको ही कायल बनाया,
जीने का हर फ़लसफ़ा था दिखाया,

वो फ़नकार क्यों अलविदा कह गया। 
वो फ़नकार क्यों अलविदा कह गया। 

नाटक हो या हो छोटा परदा,
उसने है सबको भावुक बनाया।  
कभी गुदगुदाया, 
कभी था रुलाया। 
अभिनय भी ऐसा कि क्या भूल पाएं,
ताली औरआँसू कभी रुक न पाएं। 

उसकी चमक भी कोई क्या छुपाये,
जब पश्चिम में भी उसने परचम लहराया। 

हो 'मक़बूल', 'हैदर', 'चंद्रकांता' या 'हासिल',
उसका हुनर था तारीफ़ के काबिल।      
कभी बाग़ी बनके बन्दूक थामी,
कभी वो  दरोगा, कभी छात्र नेता।
कभी था वो क़ातिल, कभी मसखरा था ,
हर किरदार में वो हमेशा खरा था।    

वो बहरूपिया अब कहाँ रुक गया ,
वो फ़नकार क्यों अलविदा कह गया। 

Friday, March 23, 2018

नयी डगर

उम्र गुज़रती रहती है 
फ़िर वक़्त फ़िसलता रहता है। 
कितना अब और भी लड़ना है 
मन ये सवाल फ़िर करता है। 

कुछ शिकस्त हम पाए हैं। 
हाँ, चोट भी अक्सर खाए हैं। 
नाकामियों से रचा हुआ,
इतिहास भी हम दोहराए हैं। 


पर क्या हम सचमुच हार चुके ?
क्या कभी नहीं होगी सहर ?
क्यों लगे किअब अँधेरा है ?
क्या नहीं दिखेगी नयी पहर ?

इतिहास तो हम दोहराते हैं। 
फ़िर भूल ये कैसे जाते हैं ?
हर किसी के बीते पलों में भी,
कुछ यादग़ार सौगातें हैं। 

क्यों न पलटें उन पन्नों को,
जिनमें वो यादें रहती हैं,
है ज़िन्दगी बेरंग नहीं,
जो ये बातें भी कहती हैं। 


इतिहास भी उनको पूजता है,
जिसने है खोया सब कुछ।
पर हार न जिसने मानी है,
 है योद्धा वो ही सचमुछ।

अपनी भी दौलत हिम्मत है।
है अपने साथ जो ये अग़र,
हर बादल फ़िर छट जाएगा,
फ़िर दिखेगी हमको नयी डगर। 

Wednesday, September 14, 2016

बस इतना हासिल कर लूं

यह कविता एक ऐसे व्यक्ति की मनोदशा को व्यक्त करती है, जो भ्रष्ट आचरण कारण कारावास की सजा काट रहा  है और जिसे अपने भ्रष्ट आचरण के कारण हुए हादसे का पश्चाताप है।   

एक नयी सुबह की दस्तक थी,
ये क़ायनात नतमस्तक थी,
एक नया पड़ाव था जीवन का,
खुशियों की कहानी तब तक थी।

फिलहाल कहानी ऐसी है,
जैसे बिन पंख परिन्दा हूँ। 
अँधेरी चार दीवारी में,
बीते लम्हों संग ज़िंदा हूँ। 

मूंदी हुयी आँखें कहती हैं
मैं आसमान में फ़िर उड़ लूँ।
एक नयी ऊंचाई फिर चूमूँ।
एक नयी ऊंचाई फिर चूमूँ।

ख्वाबों के लाखों रंगों में,
फिर ख़ुद को ज़ाहिर कर लूँ। 
बस इतना हासिल कर लूं। 
बस इतना हासिल कर लूं। 


थी ज़िद एक आगे बढ़ने की,
एक नए शिखर पे चढ़ने की। 
मेरा ग़ुरूर हमराह हुआ। 
जाने कब मैं ग़ुमराह हुआ !

कितने ही घर बर्बाद हुए 
मेरी इस ज़िद की हुक़ूमत से। 
थी चादर मेरी छोटी पर 
माँगा अधिक ज़रुरत से। 

दिखता बस एक अँधेरा है। 
लगता नाराज़ सवेरा है। 
सन्नाटों के साये में 
रोता हर ख़्वाब ये मेरा है। 

अब हिम्मत न बची है कि,
टूटे सपनों को जोड़ सकूँ। 
अपने बेबस इन हाथों से 
जीवन की कश्ती मोड़ सकूँ। 

भूल के अपना बीता कल,
फिर से एक आग़ाज़ करू।
खुद को इस काबिल कर लूँ। 
बस इतना हासिल कर लूं।
बस इतना हासिल कर लूं। 

Tuesday, April 26, 2016

हारेगा नहीं तू इस युग में

कुछ सिक्कों की खनक में जब
कुछ सफ़ेदपोश बईमान हुए,
अपनी जेबें भरने के लिए
किस हद तक वे ऐसे नादान हुए,
जब नए सुबह की उम्मीदों के
ओझल सारे अरमान हुए,
है इंसानियत का चेहरा क्या,
इस बात सब अंजान हुए,

एक तू ही था जिसे थी फ़िकर
आने वाली सदियों के लिए।

क्यों डरता है कि अकेला ही
क्या अपनी मंज़िल पाएगा !
है तूने जो आग़ाज़ किया,
तूफानों से लड़ जाएगा।
तेरे ही बदौलत है बची
हम सब में कुछ उम्मीदें हैं।
हैं सब की सदाएं संग तेरे
हर किले को फतह कर जाएगा।

लेकर फिर सुबह का उजियारा
अध्याय रचेगा कलियुग में।
टूटेगा नहीं तू इस युग में।
हारेगा नहीं तू इस युग में।


Thursday, May 28, 2015

जल का मरहम

भोर से निकला हुआ मुसाफ़िर,
बुझ कर जैसे बेहाल हुआ।
इस मुरझाये से चेहरे पे,
खुशियों का जो आकाल हुआ।
था हरियाली का साया जो,
वो न तो अबकी साल हुआ।
फसलें जो अब चौपट हुयी,
फिर किसान कंगाल हुआ।

अम्बर को निहारते रहते कि
तपता सूरज थक जायेगा।
नीला सा दिखता साया ये,
बादलों से फिर ढक जाएगा।

धरती हमसे अब ख़फ़ा हुयी,
जैसे हमसे कोई ख़ता हुयी।
आँसुओं से खेतों को सींचा,
नदियां जो अब लापता हुयी।
बारिश को तरसें हम बेबस,
पर बादलों की है आँख-मिचौली।
देकर खुशियों का ये झांसा,
लौटें लेकर अपनी टोली।

जो इंतेज़ार है सावन का,
जाने किस हद तक जाएगा!
धरती के आँचल में बादल,
जल का मरहम रख जाएगा।


Saturday, July 26, 2014

है यही दास्तां अंधेरे की

सब कुछ ही खो गया है जिसमें,
पहचान सो गयी है जिसमें,
अस्तित्व नहीं जहाँ रंगों का, 
जहाँ छोर दिखे न अंगों का,
हमदर्द जो गुनहगारों का,
कोख़ है काले कारोबारों का,
निगली जिसने परछाईं है,
बुनता है जो ख़्वाब हज़ारों का,

माशूख है चोर-लुटेरे की। 
है यही दास्तां अंधेरे की।  

जिसमें हैं घुले से रंग कई,
सदियां भी जिसमें डूब गयी। 
रौशनी से जिसकी रंजिश है। 
इससे ही उबरना ख़्वाहिश है। 
इसकी गहराई के भीतर, 
कुछ राज़ भी छिपकर रहते हैं,
जिनका सच कभी न खुल सका,
ऐसा कुछ लोग भी कहते हैं। 

एक नयी शुरुआत सवेरे की। 
है यही दास्तां अंधेरे की। 

Sunday, May 25, 2014

वो साथ नहीं मैखाने में।

This poem depicts a situation after a riot of 1992 in India, after which two drinker friends become strangers, as they didn't belong to the same religion.

जो मस्जिद कल टूटे न थे,
वो भी कभी रूठे न थे। 
थे हाथ जो मीना पे थमे, 
हम पे कभी वो उठे न थे। 
टूटी थी दीवारें मस्जिद की,
पर उन्होंने क्यों नाता तोड़ा ?
जो हैवानियत की जात थी,
उसे मेरी क़ौम से क्यों जोड़ा ?

एक सदी थी जैसे बीत गयी 
उन यारों को पाने में। 
बेवजह जो मुझसे झगड़े वो,
हारा मैं उन्हें मनाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 

खींची थी कल कुछ तलवारें।
रंगी थी लहू से दीवारें। 
बिखरी फ़िर ऐसी रंजिशें,
जिसे रोक सकी न सरकारें। 
कफ़न चढ़ी इंसानियत पे,
ऐसी फ़ैली नफ़रत की आँच। 
लगने लगे यारी के पल,
जैसे हों चुभे टूटे से काँच। 

यारी न क़ौम की ख़ातिर थी,
थक गया मैं ये समझाने में। 
अनसुनी रही फ़रियाद मेरी।
बंद है यारी तहख़ाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 

बिन उनके जाम ये रास नहीं।
कोई और भी है अब ख़ास नहीं। 
तरसूं किसी और के साथ को,
थोड़ा भी वक़्त वो पास नहीं। 
अफ़सोस उनकी नादानी पे,
जो धरम-जात पे वो रोए। 
हैरान हूँ इस नासमझी पे,
कि मेरा साथ हैं वो खोए। 

ग़म है कि सदियाँ बीत गयी,
इस उलझन को सुलझाने में।
कर सके रिहा इस ग़म से मुझे,
वो बात नहीं पैमाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 


Wednesday, May 21, 2014

मेरी ख़ामियाँ

जो पर मेरे टूटे हैं अब
बिखरा हुआ लगता है सब।
अलफ़ाज़ भी हैं खो गए,
जिन्हें ढूंढते हैं मेरे लब।
भूला हूँ मैं उस शख़्स को 
जो साथ मेरे था यहाँ। 
जो मुझमें ही कहीं छुपा था 
जिसे मिटा सका न ये जहां। 
कोसों आगे मैं बढ़ गया
पीछे हैं फ़िर भी खींचती
मेरी ख़ामियाँ।
मेरी ख़ामियाँ।

क़ाबिलियत जो थी मेरी 
उन सब को ये दफ़ना गयी। 
नाकामियों के दाग़ को,
हैं जैसे ये अपना गयी। 
क्या था हासिल जिसे भुला चुका
है ख़ोज मुझे जिसकी कबसे?
न इल्म कि कब मैं उभरूँगा 
मायूसियों के इस रब से?
हूँ मैं भी इनका साझेदार  
जिन्हें ढोती हैं मेरे साथ ये 
मेरी ख़ामियाँ।
मेरी ख़ामियाँ।

हर बार हूँ मैं ये सोचता,
कि कब ये पीछा छोड़ेंगी ?
बिखरा हूँ मैं तो सदियों से,
मुझे और ये कितना तोड़ेंगी ?
आने वाले हैं नए पल,
ऐसा गुमां हुआ है मुझे। 
इस पल में बला ये छूटेगी,
इस सोच ने छुआ है मुझे।  
[अ]ग़र इन्हे याद न मैं रहूँ 
और ये पीछे न मुड़ी कभी,
ख़ुद से पूछूंगा कहाँ गयी ?
मेरी ख़ामियाँ।
मेरी ख़ामियाँ।

Monday, May 05, 2014

तेरा वजूद भी होना है।

[अ]ग़र बयां करूँ ये दास्तां,
हूँ तेरा शुक्रग़ुज़ार मैं। 
जो शिकश्त को पीछे छोड़ा तो,
तुझपे हँसता हर बार मैं। 
अपनों की दुआएं साथ थी,
पर उन सब से भी थी बढ़कर,
तेरी रंजिश जो मुझसे थी 
किया जिसका सामना मैं  डंटकर।
जो मौके तुझको थे मिले,
उन्हें खोने का तेरा रोना है। 
मेरे मक़सद को पाने में,
तेरा वजूद भी होना है। 

था वक़्त भी तुझको खूब  मिला,
कि मुझे मात तू दे सके। 
फ़िर तूने साजिश रची ऐसी
जिससे कि मेरी रूह थके। 
जब सफ़र की एक पगडण्डी पे,
मैं गिर गया बेसुध हो कर,
तुझे हुयी ग़लतफ़हमी ये कि,
हारूँगा मैं  सबकुछ खोकर।
जो उठकर खड़ा हुआ फ़िर से,
तेरे होश तो जैसे उड़ गये। 
मेरे साहस के टूटे पर,
जैसे अब फ़िर से जुड़ गये। 
तेरी चकाचौंध फ़ीकी पड़ी। 
काहे का अब तू सोना है। 
तेरी हार के इस किस्से में 
तेरा वजूद भी होना है। 

हम एक जगह से शुरु हुए,
पर तू आगे था निकल गया। 
हारा न मैं हिम्मत फ़िर भी,
और लाया अन्दर जोश नया। 
तू मुड़कर जो देखा तो,
कोई फ़ासला अब न दिखा।
तुझसे आगे न निकल सकूँ,
इस सोच में तेरा अक्स बिका। 
तूने कांटे थे कई बिछाए,
अपनी शिकश्त के हर डर से। 
पर मैं करीब हूँ मंज़िल के,
जिसे पाने को अब तू तरसे। 

खेला तू अपने वक़्त से,
जैसे कोई नया खिलौना है 
मेरे इस जीत कि मजलिस में,
तेरा वजूद भी होना है। 

Friday, April 18, 2014

थी जिसकी वो हक़दार सदा

थी सदियों से उसकी पुकार 
कि उसको अपना हक़ मिले। 
इस संघर्ष में थी आहत,
न किसी ने उसके ज़ख़्म सिले। 
उसकी हर मांग के बदले में,
थे हर सितम उसके लिए। 
थे ज़ख्म जो भी उसको मिले,
आंसुओं ने उसको बयां  किए। 
पर आंसुओं को पोछती, 
हक़ के लिए लड़ती रही। 
लांघ के हर दहलीज वो 
आगे ही बढ़ती रही। 

टूटे न उसके हौसले 
और पा लिया उसने वो सब,
थी जिसकी वो हक़दार सदा। 
थी जिसकी वो हक़दार सदा। 

थी बंद इकलौते कमरे में। 
न घूंघट उसका हटा कभी। 
पर उसके माथे के तेज से,
न अंधेरा टिका कभी। 
न किसी ने सोचा था कभी,
कि आसमां वो छू लेगी। 
और प्रजातंत्र के हर तपके को 
उसका सारा अब हक़ देगी। 
अंतरिक्ष में जाकर उसने,
कुछ रहस्य भी सुलझाए थे। 
और कभी बेघर बच्चों पे,
उसने आँचल फैलाये थे। 

जो था 
सैलाब आंसुओं का 
फिर भी डाली कश्ती अपनी। 
घूंघट से बना के आसमां,
बसा गयी बस्ती अपनी। 

फ़िर रुका न उसका काफ़िला,
और जीत लिया उसने वो सब 
थी जिसकी वो हक़दार सदा। 
थी जिसकी वो हक़दार सदा। 

Tuesday, April 08, 2014

क्योंकि...

If you never visited a temple or a holy place or mosque, because you never felt like visiting such places and because worship means something doing something pious for you, this poem is dedicated to you.

न मंदिर मैं गया कभी,
न ही सजदे में झुका कभी। 
औरों का देखा देखी भी,
मन की करने में न रुका कभी। 

क्योंकि न मैला है मन मेरा 
न कभी बुरा ये करता है। 
देखे जो किसी का दर्द ये,
उसका हर ज़ख्म ये भरता है। 

थे पाखण्डी तो बहुतेरे,
करते थे ढोंग मानवता का। 
करते थे इबादत मतलब से 
ठगते थे भरोसा जनता का। 
देते मूरत को वो आहार,
औरों पे थी उनकी फ़टकार। 
न था उनके मन में कभी 
कि वो करें सबका उद्धार। 

न पता था मुझे कि क्या रखूं 
मानवता का पैमाना मैं। 
है कहाँ धूल में लिपटी ये,
ढूंढूं सारा तहख़ाना मैं। 

क्योंकि थी ज़रुरत एक ऐसी 
जो सबने महसूस किया। 
थी तोड़नी वो मनमानी 
जिसने सदियों से हुकुम किया। 

Friday, March 21, 2014

कुछ ऐसे अलविदा कहूँ

I dedicate this poem to a person, who came to know that soon he is going to die as he is at the last stage of cancer. He is in dilemma as to how should he treat his little bit left time of life.

भ्रम था कि मैं हूँ जी रहा 
ये ज़िन्दगी अपने लिए। 
पर ज़िन्दगी  मुझे जी रही थी 
अपना मकसद पाने के लिए। 
जो भ्रम है टूटा,
फ़िर मैं समझा,
कि मैं तो ज़रिया मात्र था,
मुस्कुराहटें लाने के लिए। 
जो  हो गया मकसद ये पूरा,
मुझको है बुलाती मौत अब 
किसी और के जीने के लिए। 

अब जो आंसू छलके तो,
इन आंसुओं में मैं दिखूं। 
न भुला सके ये दौर मुझे,
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ। 
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ।

कुछ रोज़ पहले हुआ ग़ुमान 
कि चंद लम्हे हैं बचे। 
इनको मैं कैसे जियूं,
ये बवाल अब फ़िर मचे। 
क्या मैं जियूं ख़ुद के लिए,
या फ़िर जियूं उनके लिए,
जिनकी सारी उम्मीदों ने  
हर कदम पे मेरा साथ दिए। 
जाना था दुनियां को देकर,
अपनी वो सारी दौलतें,
जिन्हें न कभी लुटा सका,
जो थी थोड़ी ही मोहलतें। 

धूल जमे मेरी कब्र पे,
पर यादों पे जमने न दूं। 
जीना चाहे मुझे ज़िन्दगी,
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ।
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ।

Sunday, March 02, 2014

फ़िर कोई क्यों ये न कहे

तन्हा सूनी गलियों में कभी
जब भी उसकी आहट सुनी,
झपटे उसपे कुछ भेड़िये
फ़िर भी न किसी ने चीख सुनी।
थी गुहार उसकी सबसे
कि कोई तो हाथ बढ़ा सके।
पर सब अपने मतलब में डूबे
अपनी एक अलग ही राह चुनी।

जो ये हालात हैं शहरों में
फ़िर कोई क्यों ये न कहे
इससे बेहतर तो बीहड़ है।

रखते हैं मूरत देवी की 
घर-घर में पूजा करते हैं।
पर बाहर समाज में ही
उसको ही सताया करते हैं।
जब कभी मोहल्ले से गुज़रे,
सब ऐसे घूरते हैं उसको,
जैसे उनके घरवालों ने
दी खुली छूट है इन सब की।
फ़िर क्यों हैं ढोंग वो करते कि 
नारी ही उनकी देवी है !
और उन्ही से उनकी भक्ति है। 

रखें जो फ़रेबी हर चेहरा 
और ढोंग रचें वो भक्ति का,
फ़िर कोई क्यों ये न कहे
हम जैसा ढोंगी और नहीं।  

Thursday, February 13, 2014

क्या पता कि...

एक दिन ऐसे ही इत्तेफ़ाक़  से 
एक मोड़ पे एक राही से मिला 
लगता था जो हारा हुआ 
जिसे ज़िन्दग़ी से था ग़िला। 
वो पहुँच गया उस मोड़ पे 
जहां हर उम्मीदें ग़ुम हुयी। 
ग़म के कई थपेड़ों से 
उसकी आँखें भी नम हुयी। 
उसने माना कुछ रहा नहीं,
अब अलविदा कहने के सिवा।
अलविदा उस ज़िन्दगी  को 
जिसकी क़ीमत वो न समझा। 

उसको समझाया मैंने कि 
हर दिन एक जैसा तो नहीं। 
क्या पता कि कल उसे वो मिले 
जिसका था वो हक़दार रहा। 

मैंने उसको बतलाया कि 
फ़िर मिलेंगे मौक़े और भी। 
बनके विजेता वो उभरे,
आएगा ऐसा दौर भी। 
जो छोड़ दी जीने कि डगर,
तो ये मौक़ा भी छूटेगा। 
मानके तुझको ही कायर 
ये जहां भी तुझसे रूठेगा। 
रह जायेगी हावी वो वजह 
जिसने तुझको मजबूर किया। 
हार के जिससे अब तूने,
ख़ुद को जीने से दूर किया। 

क्या हुआ जो न कोई साथ दे,
तू ख़ुद को ही साथी कहे। 
न सोच तू अगले जनम की,
क्या पता कि कैसा जनम रहे !

उसमें मैंने ख़ुद को देखा 
और फ़िर मुझको एहसास हुआ 
कि मेरे जीवन से भी ज्य़ादा 
ये ग़म औरों का ख़ास हुआ। 
ये बात उसे समझाया मैंने 
और उसको एक राह दिखायी 
न वो पीछे मुड़ देखे,
जीने की ऐसी चाह सिखायी। 
जो खुशियाँ उसको हैं मिली,
और जो रिश्ते उससे हैं जुड़े, 
उन सब कि ख़ातिर है जीना 
संग जिनके उसकी हर राह मुड़े। 

क्यों छोड़ के सारी खुशियों को
और छोड़ के सारे रिश्तों को 
तूने ऐसी है डगर चुनी,
जहाँ पे इनकी खबर नहीं। 

क्या पता कि जो भी है मिला 
जिनको पाकर तू खुश रहा,
न हों नसीब अगले जनम। 
न हों नसीब अगले जनम।