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Thursday, April 30, 2020

वो फ़नकार क्यों अलविदा कह गया


यह कविता भारत एवं विश्व में एक विख्यात कलाकार, श्री इरफ़ान खान जी को, जिन्हे हम ने कुछ वर्ष पहले खो दिया,  एवं उनके अभिनय के लिए समर्पित है। 

रूपहले परदे पे छाप थी जिसकी,
अनगिनत ही एक परिमाप थी जिसकी,
जिसने था सबको ही कायल बनाया,
जीने का हर फ़लसफ़ा था दिखाया,

वो फ़नकार क्यों अलविदा कह गया। 
वो फ़नकार क्यों अलविदा कह गया। 

नाटक हो या हो छोटा परदा,
उसने है सबको भावुक बनाया।  
कभी गुदगुदाया, 
कभी था रुलाया। 
अभिनय भी ऐसा कि क्या भूल पाएं,
ताली औरआँसू कभी रुक न पाएं। 

उसकी चमक भी कोई क्या छुपाये,
जब पश्चिम में भी उसने परचम लहराया। 

हो 'मक़बूल', 'हैदर', 'चंद्रकांता' या 'हासिल',
उसका हुनर था तारीफ़ के काबिल।      
कभी बाग़ी बनके बन्दूक थामी,
कभी वो  दरोगा, कभी छात्र नेता।
कभी था वो क़ातिल, कभी मसखरा था ,
हर किरदार में वो हमेशा खरा था।    

वो बहरूपिया अब कहाँ रुक गया ,
वो फ़नकार क्यों अलविदा कह गया। 

Friday, March 21, 2014

कुछ ऐसे अलविदा कहूँ

I dedicate this poem to a person, who came to know that soon he is going to die as he is at the last stage of cancer. He is in dilemma as to how should he treat his little bit left time of life.

भ्रम था कि मैं हूँ जी रहा 
ये ज़िन्दगी अपने लिए। 
पर ज़िन्दगी  मुझे जी रही थी 
अपना मकसद पाने के लिए। 
जो भ्रम है टूटा,
फ़िर मैं समझा,
कि मैं तो ज़रिया मात्र था,
मुस्कुराहटें लाने के लिए। 
जो  हो गया मकसद ये पूरा,
मुझको है बुलाती मौत अब 
किसी और के जीने के लिए। 

अब जो आंसू छलके तो,
इन आंसुओं में मैं दिखूं। 
न भुला सके ये दौर मुझे,
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ। 
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ।

कुछ रोज़ पहले हुआ ग़ुमान 
कि चंद लम्हे हैं बचे। 
इनको मैं कैसे जियूं,
ये बवाल अब फ़िर मचे। 
क्या मैं जियूं ख़ुद के लिए,
या फ़िर जियूं उनके लिए,
जिनकी सारी उम्मीदों ने  
हर कदम पे मेरा साथ दिए। 
जाना था दुनियां को देकर,
अपनी वो सारी दौलतें,
जिन्हें न कभी लुटा सका,
जो थी थोड़ी ही मोहलतें। 

धूल जमे मेरी कब्र पे,
पर यादों पे जमने न दूं। 
जीना चाहे मुझे ज़िन्दगी,
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ।
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ।