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Friday, March 21, 2014

कुछ ऐसे अलविदा कहूँ

I dedicate this poem to a person, who came to know that soon he is going to die as he is at the last stage of cancer. He is in dilemma as to how should he treat his little bit left time of life.

भ्रम था कि मैं हूँ जी रहा 
ये ज़िन्दगी अपने लिए। 
पर ज़िन्दगी  मुझे जी रही थी 
अपना मकसद पाने के लिए। 
जो भ्रम है टूटा,
फ़िर मैं समझा,
कि मैं तो ज़रिया मात्र था,
मुस्कुराहटें लाने के लिए। 
जो  हो गया मकसद ये पूरा,
मुझको है बुलाती मौत अब 
किसी और के जीने के लिए। 

अब जो आंसू छलके तो,
इन आंसुओं में मैं दिखूं। 
न भुला सके ये दौर मुझे,
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ। 
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ।

कुछ रोज़ पहले हुआ ग़ुमान 
कि चंद लम्हे हैं बचे। 
इनको मैं कैसे जियूं,
ये बवाल अब फ़िर मचे। 
क्या मैं जियूं ख़ुद के लिए,
या फ़िर जियूं उनके लिए,
जिनकी सारी उम्मीदों ने  
हर कदम पे मेरा साथ दिए। 
जाना था दुनियां को देकर,
अपनी वो सारी दौलतें,
जिन्हें न कभी लुटा सका,
जो थी थोड़ी ही मोहलतें। 

धूल जमे मेरी कब्र पे,
पर यादों पे जमने न दूं। 
जीना चाहे मुझे ज़िन्दगी,
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ।
कुछ ऐसे अलविदा कहूँ।

Thursday, September 06, 2012

उनसे ही ये दुनिया चलने लगी

कुछ चीखों और चिल्लाहटों ने
दी थी दस्तक बरसों से
पर हम अपनी दुनिया को समेटे
बेपरवाह से रहते थे
न हमें थी फ़ुरसत उस कल में
कि हम उनकी फ़रियाद सुनें
उनका हमसे न वास्ता
ये सोच बेफ़िकर रहते थे


लांघ के सारी दहलीज़ें 
इस दुनिया में वो रहने लगी 
इस दुनिया में वो रहने लगी 

फिर हमने देखे वो चेहरे
थे जिससे अंजान कई
पर कुछ लोगों के घर में
सब उन्हें हमसफ़र कहते थे
इन चेहरों के पीछे भी
कुछ और मुखौटे छिपते हैं
जिसका उनको एहसास नहीं
जिससे वो बेखबर रहते हैं
दुनिया के थे मेहमान मग़र 
उनसे ही ये दुनिया चलने लगी  
उनसे ही ये दुनिया चलने लगी