Showing posts with label worship. Show all posts
Showing posts with label worship. Show all posts

Wednesday, April 11, 2018

Culture Special: Tapta Mudradharna

It is a special ritual followed by the Madhwa sect and Vaishnavas. It is usually performed on the First Ekadashi of Ashada Month of the Hindu Calendar, which is called Shayani Ekadashi due to its significance of starting Chatur Masya Vrat (Chaturmasa).
  • Process: Mudras are usually made of gold or copper, which heated on coal fire and stamped 5 times (ladies and children are stamped only two times)at various parts of the body. It is to be noted that scriptures mention that the stamping is meant to be performed by Sanyasis only and one must not perform this ritual on themselves.
  • Reason: The belief behind the such stamping is that stamping of these mudras (Shanka, Chakra, Gada, Padma) at specified spots on the human body activate the chakras that lie beneath them. This has a special mention in scriptures (Vayu Purana, Ramamruta Maharnava etc.) and is prescribed to be done annually.
  • Scientific Reason: Scientifically,  It is believed that such act improves the immune system during rainy season and also has positive impact on the nervous system.

Tuesday, April 08, 2014

क्योंकि...

If you never visited a temple or a holy place or mosque, because you never felt like visiting such places and because worship means something doing something pious for you, this poem is dedicated to you.

न मंदिर मैं गया कभी,
न ही सजदे में झुका कभी। 
औरों का देखा देखी भी,
मन की करने में न रुका कभी। 

क्योंकि न मैला है मन मेरा 
न कभी बुरा ये करता है। 
देखे जो किसी का दर्द ये,
उसका हर ज़ख्म ये भरता है। 

थे पाखण्डी तो बहुतेरे,
करते थे ढोंग मानवता का। 
करते थे इबादत मतलब से 
ठगते थे भरोसा जनता का। 
देते मूरत को वो आहार,
औरों पे थी उनकी फ़टकार। 
न था उनके मन में कभी 
कि वो करें सबका उद्धार। 

न पता था मुझे कि क्या रखूं 
मानवता का पैमाना मैं। 
है कहाँ धूल में लिपटी ये,
ढूंढूं सारा तहख़ाना मैं। 

क्योंकि थी ज़रुरत एक ऐसी 
जो सबने महसूस किया। 
थी तोड़नी वो मनमानी 
जिसने सदियों से हुकुम किया। 

Tuesday, November 29, 2011

जब कभी यहाँ अँधेरे हों

We pray fire in every form. Even its the fire in the Sun that guides us. When we worship the God Sun, we worship the fire for its purity.

जो तेरी किरणें पड़ती हैं 
तो धरती अपनी है उजली 
दूर से ही आकाश दिखे 
शाम भी न रहती धुंधली 
शाम की घूंघट न रहती
तुझसे जब यहाँ सवेरे हों 
तुझसे ही पथ उजियारे हों 
जब कभी यहाँ अँधेरे हों 

तुझसे जलती दीपक अपनी 
जब कभी यहाँ अंधियारा हो 
गर्व हो सूरज को तुझसे 
तुझसे रौशन घर सारा है 
सबके चूल्हे जलते तुझसे 
तुझसे मंडप में फेरे हों 
तुझसे ही पथ उजियारे हों 
जब कभी यहाँ अँधेरे हों

तुझको नहीं कोई छू पाए 
तेरा कोई आकार नहीं 
तू तो है अनमोल सदा 
तेरा कोई व्यापार नहीं 
तुझसे धरती पे अन्न उगे
जब कभी ये बादल घेरे हों
तुझसे ही पथ उजियारे हों 
जब कभी यहाँ अँधेरे हों

Monday, December 13, 2010

एक आज़ाद परिंदा हूँ



तिनके सा मेरा ये जहां,
उड़के मैं जाऊं और कहाँ
तू है तो मेरा सब कुछ है
तेरे साए में जिंदा हूँ
इस खुले आसमाँ में जैसे,
एक आज़ाद परिंदा हूँ

तेरे आगे मैं कुछ भी नहीं
दुनिया ये तुझसे चलती है
तेरी दुआएं साथ रहें तो,
मेरी ये खुशियाँ पलती हैं
अपनी हर गुस्ताखी पर
मैं बेहद शर्मिंदा हूँ
इस खुले आसमाँ में जैसे,
एक आज़ाद परिंदा हूँ

शाम के ढलते मैं आ जाऊं
यह मेरी कोशिश रहती है,
अपने पर मैं वहाँ पसारू
जिस ओर हवा ये बहती है ।
लौट के मैं जो न आ पाऊं
तू ऐसे क्यों रोता है,
ऐसे जैसे कि कोई,
अपने किसी को खोता है
बिछड़ के तुझसे मैं तुझे रुलाऊं,
ऐसा न मैं दरिंदा हूँ
इस खुले आसमाँ में जैसे,
एक आज़ाद परिंदा हूँ

Friday, November 12, 2010

तेरा ये पुत्र आभारी है


I love my nation and i express my love and faith in this way.

मेरी वो माँ है जिसका,
हिम जैसा है मस्तक। 
दूर से आती सूरज की किरणें,
उसपे देती हैं दस्तक। 
तू देवी है हर मंदिर की। 
तेरा पुत्र पुजारी है। 
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है। 

पावन गंगा की है सौगंध,
न तुझे कभी रोने देंगे। 
तेरी रक्षा में जाग रहे,
पहरेदारों को न सोने देंगे। 
तेरी जय जयकार करे,
वो शिक्षक या व्यापारी है। 
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है। 

तेरी मिट्टी में हम जन्मे,
हमको इस मिट्टी पे गर्व। 
सजा के तुझको रखेंगे,
हो मेला या कोई पर्व। 
तेरे कहने पे तत्पर हैं, 
ये पुत्र तो आज्ञाकारी है। 
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है। 

तेरे चरणों में शीष झुकाऊं,
तेरी जयजयकार करूँ। 
तेरी रक्षा में अस्त्र उठाऊं,
तेरे ही आँचल में मरूं। 
तुझको हम आज़ाद करेंगे। 
अब ये शपथ हमारी है। 
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है।