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Monday, May 14, 2012

एक ठहराव जरूरी है


तू रुका है पर टूटा तो नहीं 
था साथ जो कल छूटा तो नहीं  
तेरी कोशिश से खुश हैं सभी 
तुझसे है कोई रूठा तो नहीं 
आगे बढ़ने के लिए भी 
एक ठहराव जरूरी है 
एक ठहराव जरूरी है
रहता नहीं सबकुछ पहले सा 
हर पल भी कभी टिकता ही नहीं 
जो अभी है तारा अम्बर का 
वो सुबह में तो दिखता ही नहीं 
एक नयी सुबह के लिए भी 
एक बदलाव जरूरी है 
एक बदलाव जरूरी है  

हैं मुश्किलें राहों में कई 
तुझे उनसे है लड़ना भी अभी 
रस्ता देखे मंजिल तेरा 
जहां पहुचेगा तू भी तो कभी 
अपनी जीत पाने के लिए  
एक टकराव जरूरी है 
एक टकराव जरूरी है 

Tuesday, March 27, 2012

तब मैंने हथियार चुना

आवाज़ उठी जो सही के लिए 
हुकूमतों ने दफ़न किया 
उठ गया भरोसा वादों से  
जिनका उन सब ने गबन किया 

कुछ सन्नाटों में चीखें थी 
जिनको किसी ने भी न सुना 
फरियादें जब हुयी अनसुनी
तब मैंने हथियार चुना

एक सुनहरे कल का ख्वाब जो देखा
इस दिल में कई उमीदें थी
एक नयी सोच से सजी हुयी 
मेरी आँखों की नीदें थी 

बिखर गया ख्वाबों का जहां  
जिसको सदियों से मैंने बुना 
जब राख हुयी सब उमीदें
तब मैंने हथियार चुना

Wednesday, February 22, 2012

कब दूर ये बेनूरी होगी

न दिखता है रस्ता कोई 
धुंधला सा यहाँ सवेरा है 
है दिशा कहाँ मुझको न पता 
ये कहाँ कारवाँ मेरा है 

एक रौशनी की है तलाश 
कब ये तलाश पूरी होगी 
कब बीतेगी ये रात अँधेरी 
कब दूर ये बेनूरी होगी 

हो घना अँधेरा कितना भी 
छटता है सुबह के होने पे 
रौशनी का एक ज़र्रा भी 
आता है रात के सोने पे 

मेरी मंज़िल भी दूर है मुझसे
कब ख़फ़ा भी ये दूरी होगी 
कब बीतेगी ये रात अँधेरी 
कब दूर ये बेनूरी होगी






Friday, October 28, 2011

बस तेरा ही होना चाहूँ

है आसमा, तुझसे ये इबादत
तारो के संग हो अपनी शोहबत
तू ऐसी ख्वाइश है मेरी
तू बन चूका है मेरी शिद्दत
आकर मैं तेरी पनाहों में  
तारों सा जुड़ना चाहूँ 
हो तुझमें ही मेरा ये बसेरा
बस इतना मैं तुझसे चाहूँ

सावन के आने से तू

बादलों में यूँ छिप जाता है
आफताब तेरे माथे का
इनमे ही कहीं खो जाता है
इन बादलों के पीछे मैं
तुझमे ही दिखना चाहूँ
उस चंदा से तू मुझे मिला
साथी उसका बनना चाहूँ

रात की काली चादर में
तू ग़ुम है कहाँ न जानू मैं
इमारतों के पीछे है छुपा
ऐसा ही अब मानू मैं
तू है कितना दूर खड़ा
ये दूरी कम करना चाहूँ
थाम लू तेरे आँचल को
बस तेरा ही होना चाहूँ

Tuesday, September 13, 2011

ख्वाहिश पहचान बनाने की

चढ़ गयी थकान की मैल थी जो,
कभी उसको हटा ना पाया मैं,
लौट के वापस जो पंहुचा,
जैसे सब हार के आया मैं,
खुद से ही अब ये पूछू,
की जीत के क्या हूँ लाया मैं,
कुछ जवाब मुझको ना मिले,
हर बार ही मात क्यों खाया मैं

 इन प्रश्नों में दबी हुई,
कोशिश है जीत के आने की   
कोशिश है जीत के आने की

दुनिया का दस्तूर है की,
जो जीता है उसको ही सलाम,
जो पा ना सका है मंजिल को
ना पता किसी को उसका नाम
कहाँ खो गया लक्ष्य है मेरा,
ना पता कहाँ पगडण्डी है
चलने से पहले लगे मुझे,
पड़ गयी ये सोच भी ठंडी है

रेत सी कुछ यादों में बसी,
एक सोच थी मंजिल पाने की,
एक सोच थी मंजिल पाने की


 एक मात हुई तो भी क्या हुआ,
फिर से मैं चलूँगा उसी डगर,
रुकना नहीं मुझको और कहीं,
चलना है हर एक पहर,
जब तक ना मुझे मिले मंजिल    
चलता ही रहूँगा शाम सहर 
ख़तम ना होने दूंगा कभी,
जो बहती है वो एक लहर,

भीतर भड़की इस ज्वाला में,
ख्वाहिश पहचान बनाने की 
ख्वाहिश पहचान बनाने की .

Monday, December 13, 2010

एक आज़ाद परिंदा हूँ



तिनके सा मेरा ये जहां,
उड़के मैं जाऊं और कहाँ
तू है तो मेरा सब कुछ है
तेरे साए में जिंदा हूँ
इस खुले आसमाँ में जैसे,
एक आज़ाद परिंदा हूँ

तेरे आगे मैं कुछ भी नहीं
दुनिया ये तुझसे चलती है
तेरी दुआएं साथ रहें तो,
मेरी ये खुशियाँ पलती हैं
अपनी हर गुस्ताखी पर
मैं बेहद शर्मिंदा हूँ
इस खुले आसमाँ में जैसे,
एक आज़ाद परिंदा हूँ

शाम के ढलते मैं आ जाऊं
यह मेरी कोशिश रहती है,
अपने पर मैं वहाँ पसारू
जिस ओर हवा ये बहती है ।
लौट के मैं जो न आ पाऊं
तू ऐसे क्यों रोता है,
ऐसे जैसे कि कोई,
अपने किसी को खोता है
बिछड़ के तुझसे मैं तुझे रुलाऊं,
ऐसा न मैं दरिंदा हूँ
इस खुले आसमाँ में जैसे,
एक आज़ाद परिंदा हूँ