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Tuesday, September 11, 2012

ये देश है न जागीर तेरी

कर दे तू खड़ी दीवारों को 
या डाल दे पांवों में ज़ंजीरें
चुनवा दे तू दीवारों में 
फिर भी हम लांघेंगे ये लकीरें 
पहुंचा हूँ मैं मीलों आगे 
जब से थी ये आग़ाज़ मेरी 
दफ़ना भी दे कोसों नीचे 
न थमेगी ये आवाज़ मेरी 

जिंदा हैं जब ये उम्मीदें
फिर टूटेगी ज़ंजीर तेरी
तू रोक मुझे न पायेगा
ये देश है न जागीर तेरी 

इसे खून पसीने से सींचा
आजादी के रखवालों ने
तेरे सोये ईमान को अब
कुरेदा है चंद सवालों ने
अब रोक सके तू कदम मेरे
ऐसी न है औकात तेरी
उम्मीद है मेरी क़ुर्बानी
कभी बनेगी फिर सौग़ात मेरी

इस धरती पर है दिखती
कल की उजली तस्वीर मेरी

इस देश पे मैं क़ुर्बान
ये देश है न जागीर तेरी

Thursday, November 10, 2011

दर्द का है कारवाँ

दर्द की है एक जुबां 
ये बहुत कुछ बोलती
अपनी है पहचान क्या
राज़ भी ये खोलती 
सामने तो है खड़ा 
एक खुला सा आसमां
पर यहाँ उड़ने से पहले
दर्द का है कारवाँ 

देख के रौशन जहां 
मैं भी तो था खुश कभी 
ग़ुम हुयी वो रौशनी 
हूँ जिसे ढूढता मैं अभी 
है सामने मेरे बसा 
एक वो रौशन सा जहां 
पर यहाँ जुड़ने से पहले 
दर्द का है कारवाँ 

न यहाँ मैं जानता 
कि क्या मेरी पहचान है 
शाख से जैसे गिरे 
पत्ते की ना कोई शान है 
बन के गुल मैं खिल सकूँ 
है कहाँ वो बागबां
ख़त्म हो जाकर जहां 
जो दर्द का है कारवाँ

Tuesday, September 13, 2011

ख्वाहिश पहचान बनाने की

चढ़ गयी थकान की मैल थी जो,
कभी उसको हटा ना पाया मैं,
लौट के वापस जो पंहुचा,
जैसे सब हार के आया मैं,
खुद से ही अब ये पूछू,
की जीत के क्या हूँ लाया मैं,
कुछ जवाब मुझको ना मिले,
हर बार ही मात क्यों खाया मैं

 इन प्रश्नों में दबी हुई,
कोशिश है जीत के आने की   
कोशिश है जीत के आने की

दुनिया का दस्तूर है की,
जो जीता है उसको ही सलाम,
जो पा ना सका है मंजिल को
ना पता किसी को उसका नाम
कहाँ खो गया लक्ष्य है मेरा,
ना पता कहाँ पगडण्डी है
चलने से पहले लगे मुझे,
पड़ गयी ये सोच भी ठंडी है

रेत सी कुछ यादों में बसी,
एक सोच थी मंजिल पाने की,
एक सोच थी मंजिल पाने की


 एक मात हुई तो भी क्या हुआ,
फिर से मैं चलूँगा उसी डगर,
रुकना नहीं मुझको और कहीं,
चलना है हर एक पहर,
जब तक ना मुझे मिले मंजिल    
चलता ही रहूँगा शाम सहर 
ख़तम ना होने दूंगा कभी,
जो बहती है वो एक लहर,

भीतर भड़की इस ज्वाला में,
ख्वाहिश पहचान बनाने की 
ख्वाहिश पहचान बनाने की .

Wednesday, August 03, 2011

सरहद पे खड़ा सिपाही है.


सबके मन में खुशहाली है, जब कदम टिके हैं रेतों में,
निगेहबान सरहद पे वो तो, है हरियाली खेतों में.
तिरंगे की वो आन बचाता, आज़ाद हिंद का राही है,
धरती अपनी महफूज़ सदा जब, सरहद पे खड़ा सिपाही है.

बर्फ जमी है धरती पे, फिर भी वो कदम न हिलते हैं,
दुश्मन को जब मार गिराएं, तभी वो चेहरे खिलते हैं.
दोस्त तो पीछे छूट गया, दुश्मन तो अक्सर मिलते हैं,
घर की खुशियों मैं है दरार, वादों से जिनको सिलते हैं.
खून गिरे जो धरती पे, दुश्मन से डरता ना ही वो,
धरती अपनी महफूज़ सदा जब, सरहद पे खड़ा सिपाही है.

घर से ख़त जो मिले उसे, आँखें उसकी नम होती हैं,
निगेहबान फिर भी है वो, आँखें न उसकी सोती हैं.
होकर शहीद जब घर पहुँचे, सबकी आँखें फिर रोती हैं,
सदियाँ भी क्यों न हों उदास, जब वो संताने खोती हैं.
जो अपने लहू से वतन को सींचे, सरफ़रोश की वो गवाही है
धरती अपनी महफूज़ सदा जब, सरहद पे खड़ा सिपाही है