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Friday, January 27, 2012

एक नयी सुबह को करें सलाम

उन बातों को हम भूल गए 
जिन बातों से तकरार बढ़ी 
उन दीवारों को तोड़ गए 
जो सबके थी बीच खड़ी
कब तक रखें उन बातों को 
छुपा के अपने दिल में हम 
जिनसे हम कोसों दूर रहे 
जिसने की सबकी आँखें नम

क्या खोया सब भूल के हम 
लें एक दूजे की बाहें थाम 
भुला के सारी नफरत को 
एक नयी सुबह को करें सलाम 

जो लड़े कभी हम मजहब पे 
एक दूजे का खून बहा 
धरती रोई फिर सदियों तक 
कल जो ये लहू लुहान रहा 
जो पास थी अपने वो दौलत 
उसकी न हमको कदर रही 
उनसे हम दिलों को जीत सकें 
ऐसी न हमको खबर रही 

ढूढ़ के लायें वो दौलत  
चाहो हो जो भी अंजाम  
भुला के सारी नफरत को 
एक नयी सुबह को करें सलाम 

Tuesday, September 13, 2011

ख्वाहिश पहचान बनाने की

चढ़ गयी थकान की मैल थी जो,
कभी उसको हटा ना पाया मैं,
लौट के वापस जो पंहुचा,
जैसे सब हार के आया मैं,
खुद से ही अब ये पूछू,
की जीत के क्या हूँ लाया मैं,
कुछ जवाब मुझको ना मिले,
हर बार ही मात क्यों खाया मैं

 इन प्रश्नों में दबी हुई,
कोशिश है जीत के आने की   
कोशिश है जीत के आने की

दुनिया का दस्तूर है की,
जो जीता है उसको ही सलाम,
जो पा ना सका है मंजिल को
ना पता किसी को उसका नाम
कहाँ खो गया लक्ष्य है मेरा,
ना पता कहाँ पगडण्डी है
चलने से पहले लगे मुझे,
पड़ गयी ये सोच भी ठंडी है

रेत सी कुछ यादों में बसी,
एक सोच थी मंजिल पाने की,
एक सोच थी मंजिल पाने की


 एक मात हुई तो भी क्या हुआ,
फिर से मैं चलूँगा उसी डगर,
रुकना नहीं मुझको और कहीं,
चलना है हर एक पहर,
जब तक ना मुझे मिले मंजिल    
चलता ही रहूँगा शाम सहर 
ख़तम ना होने दूंगा कभी,
जो बहती है वो एक लहर,

भीतर भड़की इस ज्वाला में,
ख्वाहिश पहचान बनाने की 
ख्वाहिश पहचान बनाने की .