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Saturday, November 19, 2011
Thursday, November 10, 2011
दर्द का है कारवाँ
दर्द की है एक जुबां
ये बहुत कुछ बोलती
अपनी है पहचान क्या
राज़ भी ये खोलती
सामने तो है खड़ा
एक खुला सा आसमां
पर यहाँ उड़ने से पहले
दर्द का है कारवाँ
देख के रौशन जहां
मैं भी तो था खुश कभी
ग़ुम हुयी वो रौशनी
हूँ जिसे ढूढता मैं अभी
है सामने मेरे बसा
एक वो रौशन सा जहां
पर यहाँ जुड़ने से पहले
दर्द का है कारवाँ
न यहाँ मैं जानता
कि क्या मेरी पहचान है
शाख से जैसे गिरे
पत्ते की ना कोई शान है
बन के गुल मैं खिल सकूँ
है कहाँ वो बागबां
ख़त्म हो जाकर जहां
जो दर्द का है कारवाँ
Tuesday, September 13, 2011
ख्वाहिश पहचान बनाने की
चढ़ गयी थकान की मैल थी जो,
कभी उसको हटा ना पाया मैं,
लौट के वापस जो पंहुचा,
जैसे सब हार के आया मैं,
खुद से ही अब ये पूछू,
की जीत के क्या हूँ लाया मैं,
कुछ जवाब मुझको ना मिले,
हर बार ही मात क्यों खाया मैं
इन प्रश्नों में दबी हुई,
कोशिश है जीत के आने की
कोशिश है जीत के आने की
दुनिया का दस्तूर है की,
जो जीता है उसको ही सलाम,
जो पा ना सका है मंजिल को
ना पता किसी को उसका नाम
कहाँ खो गया लक्ष्य है मेरा,
ना पता कहाँ पगडण्डी है
चलने से पहले लगे मुझे,
पड़ गयी ये सोच भी ठंडी है
रेत सी कुछ यादों में बसी,
एक सोच थी मंजिल पाने की,
एक सोच थी मंजिल पाने की
एक मात हुई तो भी क्या हुआ,
फिर से मैं चलूँगा उसी डगर,
रुकना नहीं मुझको और कहीं,
चलना है हर एक पहर,
जब तक ना मुझे मिले मंजिल
चलता ही रहूँगा शाम सहर
ख़तम ना होने दूंगा कभी,
जो बहती है वो एक लहर,
भीतर भड़की इस ज्वाला में,
ख्वाहिश पहचान बनाने की
ख्वाहिश पहचान बनाने की .
Thursday, August 04, 2011
SISKIYAAN Lets wipe their tears
From war on the front to the war in our own territory- this is what I refer the fight against terrorism. Also, this is a message to all who connect terrorism to religion.
Saturday, May 14, 2011
क्यों पीछे मुड कर देखूं
अपने कदम हैं राहों में
मंज़िल पे हमें पहुचना है।
पथरीली हैं राहें तो क्या
हैं राहों में कांटे तो क्या
आगे है मंज़िल मेरी
आगे चलने की मैं सोचूं
क्यों पीछे मुड कर देखूं
कुछ पीछे मैं छोड़ चला
याद नहीं वो क्या था भला
ठंडी छाओं ने मुह मोड़ा
जब तपती धुप में रहा जला
मंज़िल मेरी है दूर अभी
रुकने की सोचूं और कभी।
क्यों थमने की मैं सोचूं
क्यों पीछे मुड कर देखूं
साथ में मेरे हैं सपने
और थोड़ी उम्मीदें हैं
जगा रहूँ मैं रातों में
न आँखों में नीदें हैं।
जब मंज़िल मिल जायेगी
नींद तभी तो आएगी ।
मैं मंज़िल की ओर चलूँ
क्यों पीछे मुड कर देखूं ।
Thursday, January 06, 2011
मेरी उड़ान
ख्वाहिशें कुछ ऐसी हैं,
कि आसमां में मैं उड़ जाऊं,
बादलों को मैं छू लूँ
और इन्द्रधनुष के रंग पाऊं।
आसमान में घर हो मेरा,
परिंदों संग हो वहाँ बसेरा।
उड़ती पतंगों से पूछुंगा
कि तेरी है डोर कहाँ।
आसमान से पूछूँगा मैं,
है तेरा ये छोर कहाँ।
दिन ढलने पर भटक न जाऊं,
इसी बात से डरता हूँ ।
फिर यही सोच कर मैं रह जाऊं,
कि ऐसी ख्वाहिश क्यों करता हूँ।
इस डर से मैं उड़ न पाऊं,
ना ऐसी मजबूरी है।
मंजिल को पाने के लिए,
अपनी तैयारी पूरी है।
मुझसा न महफूज़ कोई
उस हिम कि शीतल बाहों में,
गंगा जमुना कि राहों में,
पर्वत के फैले पहरों में,
गाँव, गली और शहरों में,
गंगा जमुना कि राहों में,
पर्वत के फैले पहरों में,
गाँव, गली और शहरों में,
मुझसा न महफूज़ कोई।
वो वीर जवानों कि कुर्बानी,
वो वीर जवानों कि कुर्बानी,
सौ सदियाँ जिनकी रहें दीवानी,
जब तोड़ा था ज़ंजीरों को,
और न चलने दी थी मनमानी,
जगती दिन रात निगाहों में,
इस स्वर्ग सी तेरी पनाहों में,
मुझसा न महफूज़ कोई।
चंद्रशेखर, गांधी और भगत सिंह
जैसी जन्मी हस्ती जहां पे,
उस धरती को हर बार मैं चूमूं,
हर बार मैं चाहूँ जनम वहाँ पे।
मंदिर में और मीनारों में,
मंदिर में और मीनारों में,
सेना कि खड़ी दीवारों में,
मुझसा न महफूज़ कोई।
Friday, November 12, 2010
तेरा ये पुत्र आभारी है
I love my nation and i express my love and faith in this way.
मेरी वो माँ है जिसका,
हिम जैसा है मस्तक।
दूर से आती सूरज की किरणें,
उसपे देती हैं दस्तक।
तू देवी है हर मंदिर की।
तेरा पुत्र पुजारी है।
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है।
पावन गंगा की है सौगंध,
न तुझे कभी रोने देंगे।
तेरी रक्षा में जाग रहे,
पहरेदारों को न सोने देंगे।
तेरी जय जयकार करे,
वो शिक्षक या व्यापारी है।
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है।
तेरी मिट्टी में हम जन्मे,
हमको इस मिट्टी पे गर्व।
सजा के तुझको रखेंगे,
हो मेला या कोई पर्व।
तेरे कहने पे तत्पर हैं,
ये पुत्र तो आज्ञाकारी है।
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है।
तेरे चरणों में शीष झुकाऊं,
तेरी जयजयकार करूँ।
तेरी रक्षा में अस्त्र उठाऊं,
तेरे ही आँचल में मरूं।
तुझको हम आज़ाद करेंगे।
अब ये शपथ हमारी है।
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है।
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