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Friday, October 28, 2011

बस तेरा ही होना चाहूँ

है आसमा, तुझसे ये इबादत
तारो के संग हो अपनी शोहबत
तू ऐसी ख्वाइश है मेरी
तू बन चूका है मेरी शिद्दत
आकर मैं तेरी पनाहों में  
तारों सा जुड़ना चाहूँ 
हो तुझमें ही मेरा ये बसेरा
बस इतना मैं तुझसे चाहूँ

सावन के आने से तू

बादलों में यूँ छिप जाता है
आफताब तेरे माथे का
इनमे ही कहीं खो जाता है
इन बादलों के पीछे मैं
तुझमे ही दिखना चाहूँ
उस चंदा से तू मुझे मिला
साथी उसका बनना चाहूँ

रात की काली चादर में
तू ग़ुम है कहाँ न जानू मैं
इमारतों के पीछे है छुपा
ऐसा ही अब मानू मैं
तू है कितना दूर खड़ा
ये दूरी कम करना चाहूँ
थाम लू तेरे आँचल को
बस तेरा ही होना चाहूँ

Thursday, January 06, 2011

मेरी उड़ान


ख्वाहिशें कुछ ऐसी हैं,
कि आसमां में मैं उड़ जाऊं,
बादलों को मैं छू लूँ
और इन्द्रधनुष के रंग पाऊं।
आसमान में घर हो मेरा,
परिंदों संग हो वहाँ बसेरा।
उड़ती पतंगों से पूछुंगा
कि तेरी है डोर कहाँ।
आसमान से पूछूँगा मैं,
है तेरा ये छोर कहाँ।
दिन ढलने पर भटक न जाऊं,
इसी बात से डरता हूँ ।
फिर यही सोच कर मैं रह जाऊं,
कि ऐसी ख्वाहिश क्यों करता हूँ।
इस डर से मैं उड़ न पाऊं,
ना ऐसी मजबूरी है।
मंजिल को पाने के लिए,
अपनी तैयारी पूरी है।




Monday, December 13, 2010

एक आज़ाद परिंदा हूँ



तिनके सा मेरा ये जहां,
उड़के मैं जाऊं और कहाँ
तू है तो मेरा सब कुछ है
तेरे साए में जिंदा हूँ
इस खुले आसमाँ में जैसे,
एक आज़ाद परिंदा हूँ

तेरे आगे मैं कुछ भी नहीं
दुनिया ये तुझसे चलती है
तेरी दुआएं साथ रहें तो,
मेरी ये खुशियाँ पलती हैं
अपनी हर गुस्ताखी पर
मैं बेहद शर्मिंदा हूँ
इस खुले आसमाँ में जैसे,
एक आज़ाद परिंदा हूँ

शाम के ढलते मैं आ जाऊं
यह मेरी कोशिश रहती है,
अपने पर मैं वहाँ पसारू
जिस ओर हवा ये बहती है ।
लौट के मैं जो न आ पाऊं
तू ऐसे क्यों रोता है,
ऐसे जैसे कि कोई,
अपने किसी को खोता है
बिछड़ के तुझसे मैं तुझे रुलाऊं,
ऐसा न मैं दरिंदा हूँ
इस खुले आसमाँ में जैसे,
एक आज़ाद परिंदा हूँ