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Thursday, May 28, 2015

जल का मरहम

भोर से निकला हुआ मुसाफ़िर,
बुझ कर जैसे बेहाल हुआ।
इस मुरझाये से चेहरे पे,
खुशियों का जो आकाल हुआ।
था हरियाली का साया जो,
वो न तो अबकी साल हुआ।
फसलें जो अब चौपट हुयी,
फिर किसान कंगाल हुआ।

अम्बर को निहारते रहते कि
तपता सूरज थक जायेगा।
नीला सा दिखता साया ये,
बादलों से फिर ढक जाएगा।

धरती हमसे अब ख़फ़ा हुयी,
जैसे हमसे कोई ख़ता हुयी।
आँसुओं से खेतों को सींचा,
नदियां जो अब लापता हुयी।
बारिश को तरसें हम बेबस,
पर बादलों की है आँख-मिचौली।
देकर खुशियों का ये झांसा,
लौटें लेकर अपनी टोली।

जो इंतेज़ार है सावन का,
जाने किस हद तक जाएगा!
धरती के आँचल में बादल,
जल का मरहम रख जाएगा।


Friday, October 12, 2012

Sun and shine

Open sky and the shade of eveing. The sun is showing its blessings over the sky. It does not matter what colour of evening does this sun show to us. 

Sunday, September 23, 2012

Soaked in Sky (Charminar)



This is the image of the monument of Charminar (Hyderabad). The picture depicts the part of Charminar soaked in the sky.

Friday, October 28, 2011

बस तेरा ही होना चाहूँ

है आसमा, तुझसे ये इबादत
तारो के संग हो अपनी शोहबत
तू ऐसी ख्वाइश है मेरी
तू बन चूका है मेरी शिद्दत
आकर मैं तेरी पनाहों में  
तारों सा जुड़ना चाहूँ 
हो तुझमें ही मेरा ये बसेरा
बस इतना मैं तुझसे चाहूँ

सावन के आने से तू

बादलों में यूँ छिप जाता है
आफताब तेरे माथे का
इनमे ही कहीं खो जाता है
इन बादलों के पीछे मैं
तुझमे ही दिखना चाहूँ
उस चंदा से तू मुझे मिला
साथी उसका बनना चाहूँ

रात की काली चादर में
तू ग़ुम है कहाँ न जानू मैं
इमारतों के पीछे है छुपा
ऐसा ही अब मानू मैं
तू है कितना दूर खड़ा
ये दूरी कम करना चाहूँ
थाम लू तेरे आँचल को
बस तेरा ही होना चाहूँ

Saturday, May 14, 2011

क्यों पीछे मुड कर देखूं


अपने कदम हैं राहों में

मंज़िल पे हमें पहुचना है।
पथरीली हैं राहें तो क्या
हैं राहों में कांटे तो क्या
आगे है मंज़िल मेरी
आगे चलने की मैं सोचूं
क्यों पीछे मुड कर देखूं 

कुछ पीछे मैं छोड़ चला
याद नहीं वो क्या था भला
ठंडी छाओं ने मुह मोड़ा
जब तपती धुप में रहा जला
मंज़िल मेरी है दूर अभी
रुकने की सोचूं और कभी
क्यों थमने की मैं सोचूं
क्यों पीछे मुड कर देखूं

साथ में मेरे हैं सपने
और थोड़ी उम्मीदें हैं
जगा रहूँ मैं रातों में
आँखों में नीदें हैं। 
जब मंज़िल मिल जायेगी
नींद तभी तो आएगी
मैं मंज़िल की ओर चलूँ
क्यों पीछे मुड कर देखूं