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Sunday, December 08, 2013

कमी न थी

यूँ तो आगे बढ़ते रहे
पर राहों की कोई कमी न थी। 
साजिश करते तूफानों की 
अभी रफ़्तार थमी न थी। 
गिरते भी रहे पर न थमे 
ये कदम कभी जो न जमे। 
न रुके कभी। 
चलते रहे। 
तपती धूपों में 
ढलते रहे। 
मेरे ज़ख्मों पे लहू भी थे 
और आँखों में नमी भी थी। 
पर जो आगे लेकर चलें 
उन मुस्कुराहटों की कमी न थी। 

फ़िर हुआ सामना सच से कि 
ख़ुद राह भी अपनी चुननी है। 
मैं लाख़ करूं फ़रियाद वफ़ा की 
न किसी को मेरी सुननी है। 
जो रोक सकें मुझको अक्सर 
ऐसे अब मोड़ मिलेंगे यहाँ। 
कि थाम सकें वो कदम मेरे 
ऐसी ही जाल उन्हें बुननी हैं। 

संग चलते क़दमों की अक्सर 
आहटों की कमी भी थी। 
पर कुछ दुआओं में लिपटी 
उन राहतों की कमी न थी। 

Sunday, September 22, 2013

ठहराव के आगे

क्यों मैं सोचूं कि अब मेरी 
पहचान ख़तम होती है दिखी 
क्यों मैं सोचूं कि दुनिया ने 
है मेरी भी तकदीर लिखी 
इस अन्धकार सी  नगरी में 
क्यों ये कदम न टिकते हैं 
जिनसे दिखी थी राहें मुझे 
क्यों वो चिराग न दीखते हैं 

न पता कि अब इस राह  को भी
फिर कौन सी करवट लेनी है 
न पता कि उगते सूरज को 
फिर कब दस्तक देनी है 

ये किस जहां में पहुंचा हूँ 
ये सोच के हूँ हैरान सदा 
देख के नाकामी सूरत 
किस सोच में है फिर सारा जहां 

किस से पूछूं कि अब मुझको 
आगे किस और को जाना है 
जिसने मुझे फिर यहाँ रोका है 
नाकामी का ही वो बहाना है

जो मिले अब रौशन कारवाँ 
एक नयी सुबह को चाहूँगा 
आगे बढ़ने की जो सोची तो
अपनी हर मंज़िल पाऊंगा 
जिस और है जाना तय किया 
उस ओर ही अब मैं जाऊँगा 

Sunday, October 14, 2012

फिर भी उस राह पे चलता हूँ

शायद मैं कहीं भटक रहा था
शायद कहीं और निकल चला था
मैं मीलों आगे पहुँच गया
रस्ता तो मेरा वहीँ खड़ा था 
ठहरा न लम्हा हाथों में 
न वक़्त था कि मैं मुड़ सकूँ 
वापस ढूढुं उस रस्ते को 
जिस रस्ते से फिर जुड़ सकूँ 

फिर भूल के मैं उस मंज़िल को
मैं नयी राह अब चुनता हूँ 
एक नयी राह अब चलता हूँ  

ये सोच के आगे बढ़ा था मैं 
कि न होगी अब हार मेरी
पर आगे थी जो मुश्किलें
उनसे ही थी यलगार  मेरी
उम्मीद जो मन में बाकी थी 
उसने अपनी एक राह चुनी 
मैंने लाख मनाया पर 
फिर भी न उसने मेरी सुनी 
न है हिसाब क्या खोया मैं 
फिर भी उस राह पे चलता हूँ 
फिर भी उस राह पे चलता हूँ 

Saturday, May 14, 2011

क्यों पीछे मुड कर देखूं


अपने कदम हैं राहों में

मंज़िल पे हमें पहुचना है।
पथरीली हैं राहें तो क्या
हैं राहों में कांटे तो क्या
आगे है मंज़िल मेरी
आगे चलने की मैं सोचूं
क्यों पीछे मुड कर देखूं 

कुछ पीछे मैं छोड़ चला
याद नहीं वो क्या था भला
ठंडी छाओं ने मुह मोड़ा
जब तपती धुप में रहा जला
मंज़िल मेरी है दूर अभी
रुकने की सोचूं और कभी।
क्यों थमने की मैं सोचूं
क्यों पीछे मुड कर देखूं

साथ में मेरे हैं सपने
और थोड़ी उम्मीदें हैं
जगा रहूँ मैं रातों में
न आँखों में नीदें हैं। 
जब मंज़िल मिल जायेगी
नींद तभी तो आएगी ।
मैं मंज़िल की ओर चलूँ
क्यों पीछे मुड कर देखूं ।