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Tuesday, January 03, 2023

वो वीर सपूत थे भारत के

पश्चिम का ही परचम था।

उम्मीद का दीपक मद्धम था।

जो गीत रचे नए कल के

आज़ादी का ही सरगम था।


ख़ुदगर्ज़ नहीं वो रहा कभी,

जब आहुति देनी पड़ी।

अपने लहू से सींची धरती,

जिसपे है आज की नींव खड़ी।


थी जिनके रग में कुर्बानी,

थी जिन्होंने आज़ादी की ठानी,

वो वीर सपूत थे भारत के

वो वीर सपूत थे भारत के।


बातों का भी दौर चला।

सत्याग्रह कुछ दिन और चला।

उनकी आंखों में जाने कब से,

एक नयी सुबह का ख़्वाब पला।


हांथ सने बारूदों से,

सीने में भी चिंगारी थी।

बेड़ियों को तोड़ने की

उनकी कवायद जारी थी।

बात विचार जो विफल हुए,

संग्राम की अब तैयारी थी।


जो रहे सदा ही निगेहबान,

थामी रण की जिसने कमान,

वो वीर सपूत थे भारत के।

वो वीर सपूत थे भारत के।



जो रास न आया प्रेम भाव,

अब उन्होंने हुंकार भरी।

जा टकराए उस हुकूमत से,

जो रही सदा अहंकार भरी।

लाठी चली, गोली चली।

फांसी का डर भी बिसर गया।

कांप उठा अब दुश्मन भी,

सुनकर गरज ललकार भरी।


जिनसे है आबाद वतन,

जिनको है सबका नमन,

थे वीर सपूत वो भारत के।

हां वीर सपूत वो भारत के।



Thursday, November 07, 2013

फिर लौट के वापस आउंगा

अश्क़ों में डूबे घर से ख़त
मुझसे मिलने की इक आफ़त
छोटी बहना की हर एक शरारत
और होली पे मुझे रंगने की आदत
हर एक ने ज़िक्र किया यही
हर एक ने फिक्र किया यही
कि क्या मैं यहाँ सलामत हूँ

हर ज़िक्र को मैं फ़िर सुनकर 
हर फ़िक्र को करके दर-किनार  
छुपा के अपनी हर मजबूरी 
और पोंछ के आँसू फिर अपने 
करता सबसे झूठा वादा कि 

रंगने होली की रंगत में  
फिर लौट के वापस आउंगा

घर पे बैठी उस माँ को भी
पता है कि मैं न आउंगा
जो वो नाराज़ हो झूठ से मेरे
उसे हर मजबूरी बताऊंगा
इस माँ का दिल तो टूट गया
उस माँ कि लाज बचाने में
पिता को मेरे गर्व है मुझपे
ग़म है उन्हें मेरे न आने में

ताकि उन दिलों को जोड़ सकूँ 
और हर नाराज़गी तोड़ सकूँ 
देता हूँ दिलासा दिवाली का 
और फिर उन सब से कहता हूँ 

रौशन करने अपने घर को 
फिर लौट के वापस आउंगा


जैसे कि उनको पता था
कि मैं न फिर आ पाउँगा
वो हो गए नाराज़ मुझसे
सोचे मैं उन्हें मनाऊंगा
पर उनको है न पता
कि मैं किस हाल में हूँ यहाँ
मैं लड़ रहा हूँ इस सरहद पे
जीते हर पहर ही मौत जहाँ

उनका भी कहना ज़ायज है
उनसे मिले हुआ एक अरसा 
अपने हर फ़र्ज़ को निभा लिया
फिर भी मैं उनके साथ को तरसा 

पर मैंने ये तयं है किया
कि चाहे मुझको अब मौत मिले 
 पर लिपटा हुआ तिरंगे में 
फिर लौट के वापस आउंगा 

Thursday, August 04, 2011

SISKIYAAN Lets wipe their tears

From war on the front to the war in our own territory- this is what I refer the fight against terrorism. Also, this is a message to all who connect terrorism to religion.


Wednesday, August 03, 2011

सरहद पे खड़ा सिपाही है.


सबके मन में खुशहाली है, जब कदम टिके हैं रेतों में,
निगेहबान सरहद पे वो तो, है हरियाली खेतों में.
तिरंगे की वो आन बचाता, आज़ाद हिंद का राही है,
धरती अपनी महफूज़ सदा जब, सरहद पे खड़ा सिपाही है.

बर्फ जमी है धरती पे, फिर भी वो कदम न हिलते हैं,
दुश्मन को जब मार गिराएं, तभी वो चेहरे खिलते हैं.
दोस्त तो पीछे छूट गया, दुश्मन तो अक्सर मिलते हैं,
घर की खुशियों मैं है दरार, वादों से जिनको सिलते हैं.
खून गिरे जो धरती पे, दुश्मन से डरता ना ही वो,
धरती अपनी महफूज़ सदा जब, सरहद पे खड़ा सिपाही है.

घर से ख़त जो मिले उसे, आँखें उसकी नम होती हैं,
निगेहबान फिर भी है वो, आँखें न उसकी सोती हैं.
होकर शहीद जब घर पहुँचे, सबकी आँखें फिर रोती हैं,
सदियाँ भी क्यों न हों उदास, जब वो संताने खोती हैं.
जो अपने लहू से वतन को सींचे, सरफ़रोश की वो गवाही है
धरती अपनी महफूज़ सदा जब, सरहद पे खड़ा सिपाही है

Thursday, January 06, 2011

मुझसा न महफूज़ कोई

उस हिम कि शीतल बाहों में,
गंगा जमुना कि राहों में,
पर्वत के फैले पहरों में,
गाँव, गली और शहरों में,

मुझसा महफूज़ कोई
वो वीर जवानों कि कुर्बानी,

सौ सदियाँ जिनकी रहें दीवानी,

जब तोड़ा था ज़ंजीरों को,

और चलने दी थी मनमानी,
जगती दिन रात निगाहों में,
इस स्वर्ग सी तेरी पनाहों में,
मुझसा महफूज़ कोई
चंद्रशेखर, गांधी और भगत सिंह
जैसी जन्मी हस्ती जहां पे,
उस धरती को हर बार मैं चूमूं,
हर बार मैं चाहूँ जनम वहाँ पे
मंदिर में और मीनारों में,

सेना कि खड़ी दीवारों में,

मुझसा महफूज़ कोई

Friday, November 12, 2010

हमें पता है

कहते हैं कि तन मन धन
भारत माता को है अर्पण
कितना सच है ये हमें पता है
कितना सच है ये तुम्हे पता है
हमने देखा एक नया भारत
सन सत्तावन की कुर्बानी में
देश की हमने लाज बचाई
सरहद पे लड़े जवानी में
कहते हैं अब हमपे न
कोई आँख उठाएगा
संसद में बैठा हर कोई
देश की लाज बचाएगा
कितना सच है ये हमें पता है
कितना सच है ये तुम्हे पता है
सबने की वर्षों मेहनत
फिर संविधान बनाया था
विद्वानों ने तब जाकर
ये भ्रष्ट तंत्र दफनाया था
कहते हैं भारत पे हम अब
प्रजा का राज चलाएंगे
देश में साक्षरता और उन्नति
का हम दीप जलाएंगे
कितना सच है ये हमें पता है
कितना सच है ये तुम्हे पता है
आधा पैसा वो खाते हैं
फिर बाकी हम सब पाते हैं
जांच भी बैठे तो ये सारे
साफ़ बरी होके आते हैं
भ्रष्ट सभी यहीं बसते हैं
कहके सब हमपे हसते हैं
कहते हैं की न्याय मिलेगा
प्रयास अभी भी जारी है
बहुत हो गयी तानाशाही
अब प्रजातंत्र की बारी बारी है
कितना सच है ये हमें पता है
कितना सच है ये तुम्हे पता है

तेरा ये पुत्र आभारी है


I love my nation and i express my love and faith in this way.

मेरी वो माँ है जिसका,
हिम जैसा है मस्तक। 
दूर से आती सूरज की किरणें,
उसपे देती हैं दस्तक। 
तू देवी है हर मंदिर की। 
तेरा पुत्र पुजारी है। 
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है। 

पावन गंगा की है सौगंध,
न तुझे कभी रोने देंगे। 
तेरी रक्षा में जाग रहे,
पहरेदारों को न सोने देंगे। 
तेरी जय जयकार करे,
वो शिक्षक या व्यापारी है। 
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है। 

तेरी मिट्टी में हम जन्मे,
हमको इस मिट्टी पे गर्व। 
सजा के तुझको रखेंगे,
हो मेला या कोई पर्व। 
तेरे कहने पे तत्पर हैं, 
ये पुत्र तो आज्ञाकारी है। 
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है। 

तेरे चरणों में शीष झुकाऊं,
तेरी जयजयकार करूँ। 
तेरी रक्षा में अस्त्र उठाऊं,
तेरे ही आँचल में मरूं। 
तुझको हम आज़ाद करेंगे। 
अब ये शपथ हमारी है। 
मुझपे फ़ैले तेरे आँचल का,
तेरा ये पुत्र आभारी है।