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Sunday, May 25, 2014

वो साथ नहीं मैखाने में।

This poem depicts a situation after a riot of 1992 in India, after which two drinker friends become strangers, as they didn't belong to the same religion.

जो मस्जिद कल टूटे न थे,
वो भी कभी रूठे न थे। 
थे हाथ जो मीना पे थमे, 
हम पे कभी वो उठे न थे। 
टूटी थी दीवारें मस्जिद की,
पर उन्होंने क्यों नाता तोड़ा ?
जो हैवानियत की जात थी,
उसे मेरी क़ौम से क्यों जोड़ा ?

एक सदी थी जैसे बीत गयी 
उन यारों को पाने में। 
बेवजह जो मुझसे झगड़े वो,
हारा मैं उन्हें मनाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 

खींची थी कल कुछ तलवारें।
रंगी थी लहू से दीवारें। 
बिखरी फ़िर ऐसी रंजिशें,
जिसे रोक सकी न सरकारें। 
कफ़न चढ़ी इंसानियत पे,
ऐसी फ़ैली नफ़रत की आँच। 
लगने लगे यारी के पल,
जैसे हों चुभे टूटे से काँच। 

यारी न क़ौम की ख़ातिर थी,
थक गया मैं ये समझाने में। 
अनसुनी रही फ़रियाद मेरी।
बंद है यारी तहख़ाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 

बिन उनके जाम ये रास नहीं।
कोई और भी है अब ख़ास नहीं। 
तरसूं किसी और के साथ को,
थोड़ा भी वक़्त वो पास नहीं। 
अफ़सोस उनकी नादानी पे,
जो धरम-जात पे वो रोए। 
हैरान हूँ इस नासमझी पे,
कि मेरा साथ हैं वो खोए। 

ग़म है कि सदियाँ बीत गयी,
इस उलझन को सुलझाने में।
कर सके रिहा इस ग़म से मुझे,
वो बात नहीं पैमाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 
वो साथ नहीं मैखाने में। 


Monday, April 23, 2012

वो चला जा रहा है

रिश्ते नातों को कफ़न दिए
अरमानों को दफ़न किये
वो चला जा रहा है
वो चला जा रहा है
भूल के वो सबकी बातें
करके अनसुनी कुछ फरियादें
देकर आंसू इन आँखों में
जो यार था मेरा लाखों में
ओझल हो गया वो नज़रों से
न पता मिला फिर खबरों से  
समेट के सारे सपनों को
भूल के सारे अपनों को 
वो चला जा रहा है
वो चला जा रहा है

Friday, January 27, 2012

एक नयी सुबह को करें सलाम

उन बातों को हम भूल गए 
जिन बातों से तकरार बढ़ी 
उन दीवारों को तोड़ गए 
जो सबके थी बीच खड़ी
कब तक रखें उन बातों को 
छुपा के अपने दिल में हम 
जिनसे हम कोसों दूर रहे 
जिसने की सबकी आँखें नम

क्या खोया सब भूल के हम 
लें एक दूजे की बाहें थाम 
भुला के सारी नफरत को 
एक नयी सुबह को करें सलाम 

जो लड़े कभी हम मजहब पे 
एक दूजे का खून बहा 
धरती रोई फिर सदियों तक 
कल जो ये लहू लुहान रहा 
जो पास थी अपने वो दौलत 
उसकी न हमको कदर रही 
उनसे हम दिलों को जीत सकें 
ऐसी न हमको खबर रही 

ढूढ़ के लायें वो दौलत  
चाहो हो जो भी अंजाम  
भुला के सारी नफरत को 
एक नयी सुबह को करें सलाम 

Monday, January 02, 2012

जंग न उनपे लग जाए

जिस धड़कन में बहती थी कभी
एक सोच वो क्रांति को लाने की
उसको है अब जंग लगी
उसकी है घड़ी थम जाने की 
हम कोसते हैं उस गद्दी को
जिसपे बैठे हैं भ्रष्ट सभी
जिनके वादे भी अधूरे हैं
पूरे न होंगे वो भी कभी
हैं उम्मीदें उनसे ही जुड़ी
जो बदलें नीव जमाने की
हैं उनकी ही कोशिश पे टिकी
एक सोच सुबह को लाने की
बारूद हैं जिन बंदूकों में
जंग न उनपे लग जाए
जंग न उनपे लग जाए

कुछ सोचते हैं धन दौलत की
कुछ भागते हैं कल के पीछे
कर्म की सीढ़ी छोड़ के सब
क्यों भागते हैं फल के पीछे
न फ़ुरसत है उनको भी अभी
कि याद करें कुर्बानी वो
जिसने सींचा इस धरती को
जिनकी है एक निशानी वो
कुर्बानियों को भूल गए
एक होड़ में आगे जाने की
अब उन्ही से होगा रौशन कल
जो सोचें क्रांति को लाने की
बारूद हैं जिन बंदूकों में
जंग न उनपे लग जाए
जंग न उनपे लग जाए


Friday, November 12, 2010

मेरी परछाई


the most faithful friend is the shadow. It will accompany you wherever you go.

मेरी मंजिल यहाँ नहीं है
मुझे और भी आगे जाना है
मुझे यहाँ पे नहीं है रुकना
न ये मेरा ठिकाना है
मुझे बहुत ही देर लगेगी
तू चाहे तो अभी लौट जा
तू चाहे तो अभी लौट जा

बुरे वक़्त में साथ न कोई
तू मेरे संग आई है
न तेरा कोई नाम पता
तू तो बस एक परछाई है
मुश्किलें अभी और हैं बाकी
तू चाहे तो अभी लौट जा
तू चाहे तो अभी लौट जा

न तू मेरी मंजिल है
और न ही तू मेरा कारवां
फिर क्यों मेरे साथ आ गया
जब पता नहीं मैं चला कहाँ
आगे क्या हो कुछ पता नहीं
तू चाहे तो अभी लौट जा
तू चाहे तो अभी लौट जा