Sunday, January 01, 2023
साहस ने साथ नहीं छोड़ा
भूमिपुत्र
हो तपती धूप, या हो बदरी
पेट भरे वो हर नगरी
सींचे वो खेत लहू से भी
भले वो प्यासा हो अध्-गगरी
आभार है भूमिपुत्र का
आभार है भूमिपुत्र का
कभी तूफ़ान था मंडराया
कभी आकाल का संकट छाया
फसलें भी बेमौत मरी
पर उसने धैर्य था दिखलाया
संघर्ष है भूमिपुत्र का
संघर्ष है भूमिपुत्र का
चाहे ठिठुरे वो जाड़े में
चाहे वो झुलसे धूप में
दुलार करे वो फ़सलों को
ममता के हर रूप में
दुलार है भूमिपुत्र का
दुलार है भूमिपुत्र का
Monday, January 11, 2021
यह हार भी कुछ कह जाती है
यह हार भी कुछ कह जाती है
एक आईना सा दिखाती है।
कहीं भी ना रुकना तुझे
सबक यही सिखलाती है।
जो ठहर गया वह टूट गया
मकसद उसका तो छूट गया।
जो रहा न कोई संग तेरे,
यह हौसला ही तेरा साथी है।
सांझ ढली तो क्या हुआ
उम्मीद की लौ न बुझे कभी।
एक नई सहर फिर आएगी
एक नई डगर भी लाएगी।
क्या कसर थी बाकी रह गई
क्या कोशिश में थी कमी कोई
क्यों खुद से ना पूछा कभी
क्यों खुद से न पूछा कभी।
जो हैं लोगों के कहकहे,
अक्सर हम को फुसलाती हैं।
मझधारों से आगे जो बढ़े,
वही दास्तां कहलाती है।
Friday, March 23, 2018
नयी डगर
फ़िर वक़्त फ़िसलता रहता है।
कितना अब और भी लड़ना है
मन ये सवाल फ़िर करता है।
कुछ शिकस्त हम पाए हैं।
इतिहास तो हम दोहराते हैं।
फ़िर भूल ये कैसे जाते हैं ?
हर किसी के बीते पलों में भी,
कुछ यादग़ार सौगातें हैं।
क्यों न पलटें उन पन्नों को,
जिनमें वो यादें रहती हैं,
है ज़िन्दगी बेरंग नहीं,
जो ये बातें भी कहती हैं।
Monday, May 05, 2014
तेरा वजूद भी होना है।
हूँ तेरा शुक्रग़ुज़ार मैं।
जो शिकश्त को पीछे छोड़ा तो,
तुझपे हँसता हर बार मैं।
अपनों की दुआएं साथ थी,
पर उन सब से भी थी बढ़कर,
तेरी रंजिश जो मुझसे थी
किया जिसका सामना मैं डंटकर।
जो मौके तुझको थे मिले,
उन्हें खोने का तेरा रोना है।
मेरे मक़सद को पाने में,
तेरा वजूद भी होना है।
था वक़्त भी तुझको खूब मिला,
कि मुझे मात तू दे सके।
फ़िर तूने साजिश रची ऐसी
जिससे कि मेरी रूह थके।
जब सफ़र की एक पगडण्डी पे,
मैं गिर गया बेसुध हो कर,
तुझे हुयी ग़लतफ़हमी ये कि,
हारूँगा मैं सबकुछ खोकर।
जो उठकर खड़ा हुआ फ़िर से,
तेरे होश तो जैसे उड़ गये।
मेरे साहस के टूटे पर,
जैसे अब फ़िर से जुड़ गये।
तेरी चकाचौंध फ़ीकी पड़ी।
काहे का अब तू सोना है।
तेरी हार के इस किस्से में
तेरा वजूद भी होना है।
हम एक जगह से शुरु हुए,
पर तू आगे था निकल गया।
हारा न मैं हिम्मत फ़िर भी,
और लाया अन्दर जोश नया।
तू मुड़कर जो देखा तो,
कोई फ़ासला अब न दिखा।
तुझसे आगे न निकल सकूँ,
इस सोच में तेरा अक्स बिका।
तूने कांटे थे कई बिछाए,
अपनी शिकश्त के हर डर से।
पर मैं करीब हूँ मंज़िल के,
जिसे पाने को अब तू तरसे।
खेला तू अपने वक़्त से,
जैसे कोई नया खिलौना है
मेरे इस जीत कि मजलिस में,
तेरा वजूद भी होना है।
Thursday, February 13, 2014
क्या पता कि...
एक मोड़ पे एक राही से मिला
लगता था जो हारा हुआ
जिसे ज़िन्दग़ी से था ग़िला।
वो पहुँच गया उस मोड़ पे
जहां हर उम्मीदें ग़ुम हुयी।
ग़म के कई थपेड़ों से
उसकी आँखें भी नम हुयी।
उसने माना कुछ रहा नहीं,
अब अलविदा कहने के सिवा।
अलविदा उस ज़िन्दगी को
जिसकी क़ीमत वो न समझा।
उसको समझाया मैंने कि
हर दिन एक जैसा तो नहीं।
क्या पता कि कल उसे वो मिले
जिसका था वो हक़दार रहा।
मैंने उसको बतलाया कि
फ़िर मिलेंगे मौक़े और भी।
बनके विजेता वो उभरे,
आएगा ऐसा दौर भी।
जो छोड़ दी जीने कि डगर,
तो ये मौक़ा भी छूटेगा।
मानके तुझको ही कायर
ये जहां भी तुझसे रूठेगा।
रह जायेगी हावी वो वजह
जिसने तुझको मजबूर किया।
हार के जिससे अब तूने,
ख़ुद को जीने से दूर किया।
क्या हुआ जो न कोई साथ दे,
तू ख़ुद को ही साथी कहे।
न सोच तू अगले जनम की,
क्या पता कि कैसा जनम रहे !
उसमें मैंने ख़ुद को देखा
और फ़िर मुझको एहसास हुआ
कि मेरे जीवन से भी ज्य़ादा
ये ग़म औरों का ख़ास हुआ।
ये बात उसे समझाया मैंने
और उसको एक राह दिखायी
न वो पीछे मुड़ देखे,
जीने की ऐसी चाह सिखायी।
जो खुशियाँ उसको हैं मिली,
और जो रिश्ते उससे हैं जुड़े,
उन सब कि ख़ातिर है जीना
संग जिनके उसकी हर राह मुड़े।
क्यों छोड़ के सारी खुशियों को
और छोड़ के सारे रिश्तों को
तूने ऐसी है डगर चुनी,
जहाँ पे इनकी खबर नहीं।
क्या पता कि जो भी है मिला
जिनको पाकर तू खुश रहा,
न हों नसीब अगले जनम।
न हों नसीब अगले जनम।
Thursday, April 18, 2013
इंतज़ार है उस दिन का
दिखती न सुबह की लाली है
टिम टिम करते तारे फिर भी
रात की चादर काली है
थक हार के फिर मैं बैठ गया
और सुबह की राह भी ताकूँ मैं
पलकें अब चुप हैं सोच के कि
सुबह न आने वाली है
लेकिन ये तोड़ेंगी खामोशी
क्योंकि इन्हें सबकुछ कहना है
कब अर्ज़ ये बातों को
इंतज़ार है उस दिन का
हाँ, इंतज़ार है उस दिन का
आगे बढ़ने से पहले भी
था कुछ लोगों का साथ मिला
पर संग मेरे न चल सके
ऐसा था उनका काफ़िला
था उन्हें आगे चलना फिर भी
संग चलने की गुज़ारिश की
सब की मंजिल पर एक न थी
टूटा फिर साथ का सिलसिला
लेकिन मैं ज्यादा दूर नहीं
कुछ दूर ही अब तो चलना है
कब फतह करूँ मंजिल अपनी
इंतज़ार है उस दिन का
अब इंतज़ार है उस दिन का
Monday, May 14, 2012
एक ठहराव जरूरी है
एक ठहराव जरूरी है
हर पल भी कभी टिकता ही नहीं
जो अभी है तारा अम्बर का
वो सुबह में तो दिखता ही नहीं
एक नयी सुबह के लिए भी
एक बदलाव जरूरी है
हैं मुश्किलें राहों में कई
तुझे उनसे है लड़ना भी अभी
रस्ता देखे मंजिल तेरा
जहां पहुचेगा तू भी तो कभी
अपनी जीत पाने के लिए
एक टकराव जरूरी है