Tuesday, April 26, 2011
Saturday, February 19, 2011
उनकी खुशियों पे मरता हूँ
उनके ही हाथों में मैंने,
अपनी दो आँखें खोली थी।
साथ में उनके कुछ सपने थे,
और ममता कि झोली थी।
उनसे ही थी मेरी दिवाली,
और उनसे ही होली थी।
भले ही मुझसे कुछ न कहा,
पर आँखों में एक बोली थी।
वो मेरे भगवान् हैं और मैं,
उन्ही कि पूजा करता हूँ।
उन्ही के सपनो से जिंदा मैं,
उनकी खुशियों पे मरता हूँ।
दूर जो घर से मैं जाता हूँ,
वो आँखें नहीं सोती हैं।
मैं जब मुश्किल में पड़ जाऊं,
फिर वो आँखें रोती हैं।
घर वापस फिर कब आएगा,
उनसे यही बातें होती हैं।
उनके सपने साकार करूँ,
यही मैं सोचा करता हूँ।
उन्ही के सपनो से जिंदा मैं,
उनकी खुशियों पे मरता हूँ।
दूर भले में उनसे हूँ,
पर सपनों से नज़दीक हूँ मैं।
साथ जो मेरे उनकी दुआएं,
फिर तो यहाँ पे ठीक हूँ मैं।
ख़ुशी तो है मंजिल पाने कि,
साथ में दूरी का है ग़म ।
उनके ख़त जो मिले मुझे तो,
आँखें मेरी होती हैं नम।
किस हाल मैं हैं वो पता नहीं,
उनकी परवाह मैं करता हूँ।
उन्ही के सपनो से जिंदा मैं,
उनकी खुशियों पे मरता हूँ।
Saturday, February 05, 2011
इसी बात से डरता है
मुझको अब किस ओर है जाना
ये कुछ नहीं समझता है
जब कोई मुश्किल आये तो,
दिल ये मेरा उलझता है
रास्ते तो कई हैं लेकिन
मंज़िल कि कुछ पहचान नहीं
उन्ही रास्तों पे चलना है
और कोई अरमान नहीं
ये दिल है नादान मेरा,
हर बार ये गलती करता है
फिर ये गलती न कर बैठे
इसी बात से डरता है।
खुला आसमा देख के इसने
ख्वाहिश राखी है उड़ने की
देख के सबको साथ में उड़ते
उनसे कोशिश है जुड़ने की
आसमा कि थाह नहीं
इस बात से ये अनजाना है
थक के वापस फिर आएगा
दिल को ये समझाना है
फिर से ख्वाहिश न कर बैठे
यही तो ख्वाहिश करता है
फिर ये गलती न कर बैठे
इसी बात से डरता है।
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