Monday, February 13, 2012

एक परिंदा अब न रहा

एक परिंदा अब न रहा 
एक परिंदा अब न रहा 
जिसने देखे थे ख्वाब कई 
जिसकी यादें पीछे रह गयी 
जो खुला आसमां समझ के उसने  
अपनी एक परवाज़ चुनी 
टूट गए अरमां उसके 
न किसी ने उसकी आह सुनी
उड़ न सका है वो फिर कभी   
जबसे सपने क़ुर्बान हुए 
ख्वाब थे जितने आँखों में 
सब उससे अन्जान हुए  

एक परिंदा अब न रहा 
एक परिंदा अब न रहा 
जिसने दी सबको सोच नयी 
जिसकी यादें कुछ कह गयी 
नयी सुबह और नया हो कल 
ऐसे कुछ उसके सपने थे 
न थे उससे नाते रिश्ते 
फिर भी सब उसके अपने थे 
पूरे हों अरमान उसके,
ऐसा दिन कभी न आया था 
सबको खुशियाँ बांटी उसने,
बदले में कुछ नहीं पाया था   

उस एक परिंदे की परवाज़ें 
याद सभी को आती हैं 
वो सोच कभी न रुक पाए
सदियाँ ये सबक भी पाती हैं