आवाज़ उठी जो सही के लिए
हुकूमतों ने दफ़न किया
उठ गया भरोसा वादों से
जिनका उन सब ने गबन किया
कुछ सन्नाटों में चीखें थी
जिनको किसी ने भी न सुना
फरियादें जब हुयी अनसुनी
तब मैंने हथियार चुना
एक सुनहरे कल का ख्वाब जो देखा
इस दिल में कई उमीदें थी
एक नयी सोच से सजी हुयी
मेरी आँखों की नीदें थी
बिखर गया ख्वाबों का जहां
जिसको सदियों से मैंने बुना
जब राख हुयी सब उमीदें
तब मैंने हथियार चुना

