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Tuesday, October 09, 2012

ये ज़िन्दगी की दौलतें

है कुछ लम्हों की ज़िन्दगी 
फिर भी बुनें हम ख्वाब क्यों 
कितनी है दौलत अब बची 
ढूढें हम इसका जवाब क्यों  
मेरे बुने इन ख़्वाबों से
जो कल मुझे मिल भी गया  
मिल कर कभी जो खो सके 
चाहूँ मैं ऐसा सवाब क्यों 

ये ज़िन्दगी की दौलतें 
कुछ रोज़ की हैं अब बची 
कुछ रोज़ की हैं अब बची 

था नासमझ मैं भी तो इतना 
कि न  हुआ एहसास ये 
थोड़े बचे इस वक़्त में 
कहीं खो न दूँ जो ख़ास है 
जो पल जिए खोने के डर से 
वो तो कब के गुज़र गए 
पर खोने का डर जो मिला 
अब तक वो मेरे पास है 

जो साँसों की हैं मोहलतें 
कुछ रोज़ तक ही हैं मिली  
कुछ रोज़ तक ही हैं मिली