Thursday, October 24, 2013

कुछ दूर अभी चलना है मुझे

जब भी ये कदम बढ़ते हैं मेरे
ये वक़्त भी आगे बढ़ता है
जो था सोया सा एक सूरज
फिर आसमान में चढ़ता है
बरसात की जो कुछ बूँदें है
और चकाचौंध  जो किरणे हैं
ये मुझे अब कहती हैं

कि 
कुछ दूर अभी चलना है मुझे  
कुछ दूर अभी चलना है मुझे 

जिस रस्ते पे  चलना था मुझे 
उसके थे निशां मिटे हुए 
जो मंज़िल करनी थी हासिल 
उसके थे लाखों राही दिखे 
अपनी राहें फिर बना लिया 
और चुना एक नया सा कारवां 
पर सही राह तय करने को 

कुछ दूर अभी चलना है मुझे  
कुछ दूर अभी चलना है मुझे 


मैं खड़ा हूँ अब उस मोड़ पे कि 
मेरी हर शक्ति ख़तम हुयी 
पर मुझको इस दूरी से 
दिखती नज़दीक वो मंजिल है 
पर उस तक चलने के लिए 
ताकि उसका दर चूम सकूँ 

कुछ दूर अभी चलना है मुझे  
कुछ दूर अभी चलना है मुझे

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Wednesday, October 23, 2013

बिछड़ा चेहरा

आगे की होड़ में ही कहीं
एक भाग दौड़ में ही कहीं
मुझे छोड़ गया कब खबर नहीं
फिर ढूँढू क्या उसे वहीं

बिछड़ा चेहरा
बिछड़ा चेहरा
न मिला कभी
बिछड़ा चेहरा

जब निकला मैं अपने घर से
तब से वो मेरे साथ ही था
फिर नए शहर में जब आया
हर किसी को चेहरा रास नहीं
पर इस नादान के सिवा
था कोई भी दूजा पास नहीं

जब मिलता था मक्कारों से
उनको इसने बइमान कहा
पर इस नादान को क्या पता
की उन्हें नापसंद है सच्चाई
फिर भी ये मूरख न सुधरा
इसने हर सच की कीमत चुकाई

मैं लड़ बैठा इस चेहरे से
जिसने न सीखी थी चतुराई
फिर छोड़ के जो ये चला गया
कभी भी इसकी खबर न आयी

बाँध के तानों की गठरी
कहाँ ग़ुम हुआ मेरा चेहरा
फिर मिला नहीं बिछड़ा चेहरा
फिर मिला नहीं बिछड़ा चेहरा