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Saturday, October 12, 2013

कहता ये अलविदा सावन है

हफ़्तों पहले की बात थी जब
तू ने दी दस्तक ख़बरों से
सब निहारते रहे आसमां
पुष्प भी पूछे भवरों से
की कब तू आएगा मेरे आँगन
उमीदों के शहरों से
मुक्त करेगा धरती को
सूखे-आकाल के पहरों से

फिर तू आया

खुशियाँ  लाया
खेतों में दिखी
खुशियों की छायाa
और अब तेरी ही बदौलत
बूंदों से भरा फिर आँगन है
बूंदों से भरा फिर आँगन है

तू सबका मेहमान था

पर तू ने की ख़ातिरदारी
कुछ पल तू सबके साथ रहा
फिर वापस जाने की तैयारी
चाहे ये आसमा की तू ठहरे
फिर है ये गुज़ारिश लहरों की
कहीं और न जा अब तू रुक जा
ये दुआ है साँझ-दोपहरों की


पर अब तुझको जाना ही है

कहीं और है तेरा इंतज़ार
जो न पहुँचा तू वहाँ अगर
वो रहेंगे फिर तो बेकरार
छोड़ के भीगी सी यादें
कहता ये अलविदा सावन है
कहता ये अलविदा सावन है

Tuesday, July 24, 2012

Reflexion on Floor


This photo was clicked on a rainy day at NALSAR University of Law, Hyderabad. The special feature about this image is that the floor on which the words DINING HALL is reflected was full of water as a result of rain. Due to the water on the floor, the words are clearly visible.

Friday, June 29, 2012

हम पूछ रहे हैं अब खुद से

सूरज की गर्मी से जली 
फिर आज ये अपनी धरती है 
सूखी अब फसलें हैं पड़ी 
भूखी अब जनता मरती है
ऊंची खड़ी इमारतों ने 
हवा का रुख़ फिर रोका है 
हम पूछ रहे हैं अब खुद से 
कि कहाँ हवा का झोंका है 

बारिश की बूंदों से फिर 
धरती की तपिश है थमी रही 
पर बादलों की आँख मिचौली 
से आँखों में नमी रही 
हो रही है बंजर ये धरती 
हरियाली एक धोखा है  
हम पूछ रहे हैं अब खुद से 
कि कहाँ हवा का झोंका है