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Wednesday, August 13, 2014
Saturday, October 12, 2013
कहता ये अलविदा सावन है
हफ़्तों पहले की बात थी जब
तू ने दी दस्तक ख़बरों से
सब निहारते रहे आसमां
पुष्प भी पूछे भवरों से
की कब तू आएगा मेरे आँगन
उमीदों के शहरों से
मुक्त करेगा धरती को
सूखे-आकाल के पहरों से
फिर तू आया
खुशियाँ लाया
खेतों में दिखी
खुशियों की छायाa
और अब तेरी ही बदौलत
बूंदों से भरा फिर आँगन है
बूंदों से भरा फिर आँगन है
तू सबका मेहमान था
पर तू ने की ख़ातिरदारी
कुछ पल तू सबके साथ रहा
फिर वापस जाने की तैयारी
चाहे ये आसमा की तू ठहरे
फिर है ये गुज़ारिश लहरों की
कहीं और न जा अब तू रुक जा
ये दुआ है साँझ-दोपहरों की
पर अब तुझको जाना ही है
कहीं और है तेरा इंतज़ार
जो न पहुँचा तू वहाँ अगर
वो रहेंगे फिर तो बेकरार
छोड़ के भीगी सी यादें
कहता ये अलविदा सावन है
कहता ये अलविदा सावन है
तू ने दी दस्तक ख़बरों से
सब निहारते रहे आसमां
पुष्प भी पूछे भवरों से
की कब तू आएगा मेरे आँगन
उमीदों के शहरों से
मुक्त करेगा धरती को
सूखे-आकाल के पहरों से
फिर तू आया
खुशियाँ लाया
खेतों में दिखी
खुशियों की छायाa
और अब तेरी ही बदौलत
बूंदों से भरा फिर आँगन है
बूंदों से भरा फिर आँगन है
तू सबका मेहमान था
पर तू ने की ख़ातिरदारी
कुछ पल तू सबके साथ रहा
फिर वापस जाने की तैयारी
चाहे ये आसमा की तू ठहरे
फिर है ये गुज़ारिश लहरों की
कहीं और न जा अब तू रुक जा
ये दुआ है साँझ-दोपहरों की
पर अब तुझको जाना ही है
कहीं और है तेरा इंतज़ार
जो न पहुँचा तू वहाँ अगर
वो रहेंगे फिर तो बेकरार
छोड़ के भीगी सी यादें
कहता ये अलविदा सावन है
कहता ये अलविदा सावन है
Tuesday, July 24, 2012
Reflexion on Floor
Friday, June 29, 2012
हम पूछ रहे हैं अब खुद से
सूरज की गर्मी से जली
फिर आज ये अपनी धरती है
सूखी अब फसलें हैं पड़ी
भूखी अब जनता मरती है
ऊंची खड़ी इमारतों ने
हवा का रुख़ फिर रोका है
हम पूछ रहे हैं अब खुद से
कि कहाँ हवा का झोंका है
बारिश की बूंदों से फिर
धरती की तपिश है थमी रही
पर बादलों की आँख मिचौली
से आँखों में नमी रही
हो रही है बंजर ये धरती
हरियाली एक धोखा है
हम पूछ रहे हैं अब खुद से
कि कहाँ हवा का झोंका है
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