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Friday, November 29, 2013

क्या उसकी गलती थी कि

उसने था सुना कि पढ़ने को
बस था आखर का ज्ञान जरूरी 
पर उसकी छोटी जाति ने ही 
रखी उसकी इच्छा ये अधूरी 
था उसके घर का सपना कि 
वो अपने घर का चिराग बने
पर जाति की अड़चन ने चाहा कि 
वो दुनिया पे दाग बने
जब न सच हो सका वो सपना 
फिर उसने खुद से पूछा कि

क्या उसकी गलती थी कि
उसने इस घर में जन्म लिया 


इसकी श्रद्धा थी मिलने की उसे 
जिसे सब पूजा करते थे 
 पर उस दर पे जाने को तो 
सब जाति ही पूछा करते थे 
मिल न सका वो कभी उससे 
जिसने रचना की श्रृष्टि की 
पर क्यों उससे है भेद भाव
न किसी ने इसकी पुष्टि की
कभी सपने में जो प्रभु मिले 
उनसे इसने फिर पूछा कि 

क्या उसकी गलती थी कि
वो जन्मा उसकी इस श्रिष्टि में

हम सबको पता वो गलत नहीं 
फिर क्यों उसको ऐसे देखें कि 
जैसे उसने गलती की है 
जन्म लेकर के उस जाति में 
क्यों उसको मजबूर करें 
कि वो सोचे अब ऐसा कि 

क्या उसकी गलती थी कि
वो जन्मा हम इंसानों में