Friday, July 07, 2017

बेसब्री से इंतज़ार किया

पारा पैंतालीस पार किया,
कितनों का फिर संहार किया!
उस प्रकोप से कौन बचे ,
जब ऐसा अत्याचार किया। 

धरती का आँचल सूख गया।  
नदियाँ भी हँसना भूल गयी। 
खेतों की हरियाली भी,
जाने कब से ग़ायब हुयी। 

आसमान से किरणों ने 
ताबड़तोड़ है वार किया। 
काली बदरी की फौजों का 
बेसब्री से इंतज़ार किया। 

फ़िर काली बदरी छाई है 
बूंदों की फ़ौज भी लायी है 
जो भी खोया किसान ने,
ये छोटी सी भरपाई है। 

तलवार चली फ़िर बिजली की,
और बाण चले हैं बूंदों के। 
जब सावन सबका मीत हुआ,
तो दुश्मन भी भयभीत हुआ। 

मानसून जो आया है। 
संग सौग़ात भी लाया है। 
न खोने का कोई ग़म रहा,
इतना जो हमने पाया है। 

एक ऐसा ही उपकार किया 
एक ऐसा ही उपकार किया।