Thursday, December 18, 2014

ऐसी हो कल की सुबह

हूँ बैठा मैं इंतज़ार में,
कि वो दिन भी आएगा,
जब देकर सब को ही खुशियाँ,
ये दिन यूँ ही ढल जाएगा।
खिलते फ़ूलों जैसे ही,
सबके चेहरे खिलने लगें।
मुस्कुराहटों की आस में,
अपनी नीदों से हम जगें।

और हमें मिले जीने की वजह।
ऐसी हो कल की सुबह।

सोते हुए सपनें बोलें कि,
अब और न इनको सोना है।
मैले कल की चादर में नहीं,
एक नए लिबास में होना है।
हर फतह की दावेदार ये,
अपनी राहों में चल पड़ें।
उम्मीदें हैं जो इनसे जुड़ी,
इन्हें साकार ही होना है।

दे इन्हें आगे बढ़ने की ज़िरह,
ऐसी हो कल की सुबह।