Monday, July 28, 2014

आँखें न मूंदो मेरी अभी

कुछ सपने देखने दो मुझे
कुछ तो मुझे आगे बढ़ने दो। 
आख़र क्या है क्या पता मुझे 
कुछ तो पन्ने मुझे पढ़ने दो। 
क्या खुशबुएँ हैं बाग़ों में 
न मैं उनसे रूबरू हुयी। 
क्या कह गयी हवा मुझसे,
मेरी न ही गुफ़्तग़ू हुयी। 
मेरे इस राह में काँटे तो 
हैं बिछाए जो दुश्मन सभी। 
कि मैं इनमें अब उबर सकूँ,
आँखें न मूंदो मेरी अभी। 

क्यों है ये डर कि तू सोचे,
न जी सकूंगी मैं और यहाँ,
जो न महफूज़ मैं तेरे आंचल में,
हूँ महफ़ूज़ मैं और कहाँ ?
हैं जिन्होंने सब दस्तूर लिखे,
क्या हैसियत है उन सब की?
कि है दूबर जीना मेरा 
छूटी ये सोच जाने कब की। 
क्यों लगता है कि दूजे दर पे,
न मिलेगा तेरा प्यार कभी ?
कि ख़ोज सकूँ मैं ऐसा प्यार 
आँखें न मूंदो मेरी अभी।